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UP : हाईकोर्ट की टिप्पणी- सामूहिक दुष्कर्म को साबित करने के लिए हमेशा यह जरूरी नहीं कि निजी अंगों पर चोट हो

Wed, 01 Oct 2025 07:36 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सामूहिक दुष्कर्म के अपराध को साबित करने के लिए हमेशा यह जरूरी नहीं कि पीड़िता के निजी अंगों पर चोट के निशान हों।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सामूहिक दुष्कर्म के अपराध को साबित करने के लिए हमेशा यह जरूरी नहीं कि पीड़िता के निजी अंगों पर चोट के निशान हों। इस टिप्पणी संग कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए दुष्कर्म के तीन दोषियों को सजा से मुक्त कर दिया है, लेकिन मुख्य आरोपी इरफान उर्फ गोलू की 20 साल की सजा बरकरार रखी है। यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर की एकल पीठ ने दिया है।

महोबा के चरखारी थाने में जनवरी 2015 को एक मुकदमा दर्ज कराया गया था। इसमें 15 वर्षीय पीड़िता ने आरोप लगाया था कि उसे शराब पिलाकर चार लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म किया। ट्रायल कोर्ट ने मार्च 2017 के आदेश से इरफान उर्फ गोलू, इरफान, रितेश उर्फ शानू और मानवेंद्र उर्फ कल्लू को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक को 20 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई तो फैसले हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

अपीलकर्ताओं के अधिवक्ता ने दलील दी कि मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार पीड़िता के निजी अंगों पर कोई चोट के निशान नहीं पाए गए हैं। मुख्य आरोपी के अतिरिक्त तीन आरोपियों के नाम पीड़िता ने एफआईआर में दर्ज नहीं कराए थे। घटना के लगभग आठ महीने बाद अदालत में पीड़िता के बयान में तीनों का नाम आया। वहीं, तीनों आरोपियों की परेड नहीं कराई गई।

कोर्ट ने कहा कि जहां पीड़िता का मौखिक बयान विश्वसनीय और सुसंगत होता है, वहां चिकित्सीय साक्ष्य के ऊपर इसे प्राथमिकता दी जाएगी। पीड़िता लगातार इस बात पर कायम रही कि उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को आंशिक रूप से पलट दिया। दोषी ठहराए गए इरफान, रितेश और मानवेंद्र को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। वहीं, कोर्ट ने मुख्य आरोपी इरफान उर्फ गोलू की अपील खारिज कर सजा बरकरार रखी।

इरफान उर्फ गोलू की सजा इसलिए बरकरार रखी गई है, क्योंकि, वह एकमात्र ऐसा आरोपी था जिसे पीड़िता पहले से जानती थी और जिसका नाम घटना के तुरंत बाद दर्ज कराई गई प्राथमिक शिकायत में भी था। -इलाहाबाद हाईकोर्ट

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