फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

High Court : निर्दोष नागरिकों पर हमले का लाइसेंस नहीं है पुलिस की वर्दी, मुकदमे को रद्द करने वाली याचिका खारिज

Tue, 29 Apr 2025 07:54 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस की वर्दी निर्दोष नागरिकों पर हमला करने का लाइसेंस नहीं है। लोक सेवक यदि आधिकारिक कर्तव्यों के दायरे से बाहर आकर कोई गैरकानूनी कार्य करते हैं तो उनपर मुकदमा दर्ज कराने से पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।
विज्ञापन
अदालत का आदेश - फोटो : istock
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस की वर्दी निर्दोष नागरिकों पर हमला करने का लाइसेंस नहीं है। लोक सेवक यदि आधिकारिक कर्तव्यों के दायरे से बाहर आकर कोई गैरकानूनी कार्य करते हैं तो उनपर मुकदमा दर्ज कराने से पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।

यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने आवेदक पुलिसकर्मियों की उनपर दर्ज मुकदमे की संपूर्ण कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली अर्जी खारिज दी। यह आदेश न्यायमूर्ति राजवीर सिंह की पीठ ने अनिमेष कुमार और तीन अन्य की अर्जी पर दिया है।

फर्रूखाबाद जिले की कोतवाली में आवेदकों पर विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया था। शिकायतकर्ता डॉक्टर ने आरोप लगाया था कि वह 28 जून 2022 को अपने साथियों के साथ कार से जा रहे थे। इसी दौरान उनकी कार आरोपी पुलिसकर्मियों की कार से रगड़ गई।

इस पर आरोपी पुलिसकर्मियों ने उन्हें खुदागंज के पास रोक लिया। इसके बाद उपनिरीक्षक अनिमेष कुमार, कांस्टेबल दुष्यंत, कांस्टेबल कुलदीप यादव, कांस्टेबल सुधीर व अन्य ने उनके साथ मारपीट की। साथ ही रुपये व सोने की चेन छीन ली।

पीड़ित ने बताया कि उन्हें करीब डेढ़ घंटे तक बंधक भी बनाया गया। आरोपियों ने जनवरी 2024 में पारित समन आदेश सहित पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

आरोपी पुलिसकर्मियों के वकील ने दलील दी कि उन पर झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया है। कथित घटना के समय आवेदक पुलिसकर्मी होने के नाते गश्त पर थे। ऐसे में कानून के अनुसार सक्षम अधिकारी से मंजूरी प्राप्त किए बिना उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

शासकीय अधिवक्ता ने दलील दी कि लोक सेवक जब अपने आधिकारिक कर्तव्य के दायरे में कार्य कर रहे हैं, तभी उनपर मुकदमा दर्ज करने से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता है।

न्यायालय ने आरोपों की जांच की तो पाया कि घटना के समय आवेदक कथित घटना स्थल पर गश्त नहीं कर रहे थे। हमले और छिनैती के कथित कृत्य का आवेदकों के आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन के साथ कोई तर्कसंगत संबंध नहीं था। गवाहों के बयान व मेडिकल रिपोर्ट से घटना का समर्थन करती है। इसके बाद कोर्ट ने अर्जी खारिज कर दी।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें