इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी यूट्यूबर है और रील्स बनाकर कमाती है, इस आधार पर उसके भरण-पोषण के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। अनुमान नहीं, दोनों पक्षों की वास्तविक आय का सटीक आकलन होने के बाद ही इस पर निर्णय लिया जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति हरवीर सिंह की एकल पीठ ने बरेली की फरहा नाज की याचिका पर दिया है।
फरहा नाज की शादी बरेली के नगर पालिका के तृतीय श्रेणी कर्मचारी से हुई थी। शादी के कुछ दिन बाद विवाद होने पर याची ने परिवार न्यायालय में भरण-पोषण के लिए वाद दायर किया था। न्यायालय ने कहा कि पत्नी यूट्यूबर है, वह रील्स बनाती है और अपना गुजारा करने में सक्षम है। इस आधार पर उसके दावे को खारिज कर दिया तो उसने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
कोर्ट ने कहा कि परिवार न्यायालय ने यह तो माना कि पत्नी रील्स बनाकर कमा रही पर कितना कमा रही है, यह स्पष्ट नहीं है। केवल अनुमान के आधार पर भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता। दोनों पक्षों को अपनी आय के हलफनामे, आईटीआर और पे-स्लिप जैसे दस्तावेज पेश करने चाहिए। कोर्ट ने परिवार न्यायालय के 10 मार्च 2025 को पारित आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही कोर्ट ने मामले को वापस भेजते हुए कहा कि दोनों पक्षों की आय का पूर्ण विवरण और दस्तावेज का आकलन करने के बाद परिवार न्यायालय नया आदेश पारित करे।