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High Court : भरण-पोषण का आदेश रद्द, हाईकोर्ट ने कहा- पितृत्व पर संदेह होने पर डीएनए जांच जरूरी

Thu, 26 Mar 2026 06:04 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में किसी बच्चे के जैविक पिता की पहचान को लेकर गंभीर विवाद हो, वहां डीएनए जांच कराना न्यायसंगत है। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के एक नाबालिग लड़की को भरण-पोषण देने के आदेश को रद्द कर दिया है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में किसी बच्चे के जैविक पिता की पहचान को लेकर गंभीर विवाद हो, वहां डीएनए जांच कराना न्यायसंगत है। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के एक नाबालिग लड़की को भरण-पोषण देने के आदेश को रद्द कर दिया है। साथ ही कहा कि पिता और संतान दोनों को अपने ''जैविक सत्य'' को जानने का अधिकार है। यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की पीठ ने दिया है।

सोनभद्र निवासी जवाहर लाल जायसवाल हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता ने सोनभद्र परिवार न्यायालय के मार्च 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे एक नाबालिग लड़की को भरण-पोषण के रूप में छह हजार रुपये प्रति माह देने का निर्देश दिया गया था।

याचिकाकर्ता का कहना था कि उसकी पत्नी जून 1994 में विवाह के बाद फरवरी 2000 में बिना किसी वैध कारण के घर छोड़कर चली गई थी। उसका आरोप था कि पत्नी किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध में रहने लगी। वहीं, 2011 में पत्नी को बच्ची का जन्म हुआ। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि 2000 के बाद उनके बीच कोई संबंध नहीं थे, इसलिए वह बच्ची का जैविक पिता नहीं है।

हाईकोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद पाया कि बच्ची का जन्म 1 जनवरी 2011 को हुआ, जबकि जन्म प्रमाण पत्र में यह तिथि 20 नवंबर 2009 दर्ज थी। मेडिकल रिकॉर्ड से पता चला कि महिला ने 2017 में एक और बच्चे को जन्म दिया, जिसमें आधिकारिक तौर पर उसके कथित साथी को पिता बताया गया था।

कोर्ट ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि महिला 2000 के बाद अपने पति के पास कब और कितनी बार गई। यह भी कहा कि यदि जैविक पिता का पता नहीं चलता है, तो यह संशय पिता और पुत्री दोनों को जीवन भर परेशान करता रहेगा। कोर्ट ने ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों को हवाला देते हुए कहा कि पितृत्व के अनसुलझे मुद्दों के कारण भरण-पोषण के विवाद को लटकाना उचित नहीं है। इसी के साथ नाबालिग लड़की का डीएनए परीक्षण कराने का निर्देश दिया गया। डीएनए रिपोर्ट आने के बाद पारिवारिक न्यायालय को तीन महीने के भीतर नए सिरे से फैसला करने का आदेश दिया गया है।

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