इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामले में जेल में बंद सीजीएसटी डिवीजन-एक मेरठ के इंस्पेक्टर विकास कुमार की जमानत अर्जी मंजूर कर ली है। यह आदेश न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की पीठ ने विकास कुमार बनाम सीबीआई के मामले में दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद पारित किया।
शिकायतकर्ता व्यापारी अनिल राघव ने आरोप लगाया कि उसके फर्म के बिलों में कमी बताकर आरोपी विकास कुमार ने 2 लाख रुपये की रिश्वत मांगी थी। इस मामले में सीबीआई ने सीजीएसटी दफ्तार के निरीक्षक विकास सिहं और अधीक्षक आफताब सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। आरोपी विकास ने जमानत के लिए हाईकोर्ट में अर्जी दायर की। याची अधिवक्ता ने दलील दी गई कि कथित रिश्वत की रकम सह-आरोपी से बरामद हुई थी, जिसे पहले ही जमानत मिल चुकी है। ऐसे में याची को भी जमानत दी जानी चाहिए।
कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद पाया कि स्वतंत्र गवाह ने अपने बयान में कहा था कि उन्होंने शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच की बातचीत नहीं सुनी थी। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अग्रिम जमानत अर्जी का खारिज होना नियमित जमानत के लिए कोई बाधा नहीं है। कोर्ट ने पाया कि मामले में अधिकतम सजा सात साल है और आवेदक 27 अक्तूबर 2025 से जेल में है। चूंकि आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है और आवेदक के भागने या सबूतों से छेड़छाड़ करने की कोई ठोस संभावना नहीं दिखाई गई, इसलिए न्याय के सिद्धांतों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया।