इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मरणासन्न अवस्था में बयान सीधे पीड़ित की ओर से न दिया गया हो और उसे दर्ज करने की प्रक्रिया संदिग्ध हो तो उसे सजा का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति मदनपाल की खंडपीठ ने बेटी पर तेजाब फेंककर हत्या करने के बरेली निवासी आरोपी पिता को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा रद्द कर दी।
बिजनौर के नजीबाबाद थाने में अहमदी अली ने दिसंबर 2016 में बहनोई राईस अहमद के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोप लगाया था कि कथित तौर पर प्रेम प्रसंग से नाराज होकर राईस ने अपनी बेटी का गला घोंटने की कोशिश की और पहचान मिटाने के लिए उस पर तेजाब फेंक दिया। इलाज के दौरान दिल्ली के एम्स में 23 दिसंबर 2016 को उसकी मृत्यु हो गई। मामले में ट्रायल कोर्ट ने 2020 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई तो फैसले को राईस ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पाया कि पीड़िता का बयान दर्ज करने वाले नायब तहसीलदार ने प्रति परीक्षण में स्वीकार किया कि वह बोलने की स्थिति में नहीं थी। उसका बयान एक अज्ञात महिला रिश्तेदार की मदद से दर्ज किया गया था, जो पीड़िता की अस्पष्ट आवाज को सुनकर उन्हें बता रही थी। पीड़िता का बयान दर्ज करने वाली उस महिला का नाम या विवरण रिकॉर्ड में नहीं था। इससे उसकी सत्यता की जांच नहीं की जा सकी। साथ ही शिकायतकर्ता और अन्य ने ट्रायल के दौरान बयान से मुकर गए।
प्रति परीक्षण
इसका मूल अर्थ है कि किसी साक्षी ने पूर्व में जो बात कही थी, क्या अब भी उस पर कायम है या नहीं।