अति हरि कृपा जाहि पर होई। पाऊं देइ एहिं मारग सोई।...
राम चरित मानस की यह चौपाई पूर्व आबकारी निरीक्षक रामदेव प्रसाद सोनी मानस मधुकर पर बिलकुल सही बैठती है। इन्होंने अपने जीवनकाल में एक-दो नहीं, बल्कि 11 पुस्तकें रच दीं। छोटी सी उम्र में बाबा को रामचरित मानस का पाठ करते देख, यह भी मन रामधुन में रम गए। इसके बाद राम भक्त हनुमान की ऐसी कृपा हुई कि उन्होंने 27 साल की उम्र में 48 देशों में विख्यात श्रीमानस-भ्रम-भंजनी जैसा शोध ग्रंथ लिख दिया। भगवान राम को लेकर जो प्रश्न उठता, रामदेव प्रसाद उसकी खोज में लग जाते। ऐसे 540 प्रश्नों का प्रमाण सहित उत्तर इस ग्रंथ में मौजूद हैं।
राम प्रसाद बताते हैं कि उनके बाबा रामकथा कहते थे। धीरे-धीरे वह भी अपने बाबा के साथ कथा कहने लगे। इस दौरान उनके मन में भगवान राम और उनसे जुड़े कई प्रसंगों को लेकर सवाल आते थे। ऐसे में उन्होंने उन सभी सवालों का जवाब खोजना शुरू किया। इस दौरान उन्होंने रामभक्त हनुमान की कृपा से रामचरित मानस पर आधारित 540 प्रश्नों के प्रमाण सहित उत्तर के साथ श्रीमानस-भ्रम-भंजनी ग्रंथ की रचना की। वह नौकरी में रहते हुए प्रतिदिन सुबह छह से नौ और शाम छह से 11 बजे तक भगवान राम आधारित साहित्य लेखन किया करते थे। इसके अलावा वह नि:शुल्क रामकथा भी कहते हैं।
उन्होंने श्रीमानस-भ्रम-भंजनी के अलावा हनुमान जी के जीवन चरित्र पर आधारित मारुति महिमा, कैकेयी का कलंक, मानस के मोहक प्रसंग, मानस पात्राजंलि, श्रीभरत कथामृत, मधुकर मोहिनी, मधुकर पद्यांजलि, श्रीमारुति चालीसा, क्यों सुंदर है सुंदरकांड और श्रीमद्भागवतगीता प्रश्नोत्तरी शतक लिखी है। इसके अलावा अब तक जो अभी प्रकाशित नहीं हुए हैं, उसमें मानस प्रश्नोत्तरी सुधा, श्रीमारुति काव्यांजलि शामिल है। उन्हें लोक जागरण, प्रयाग से संत तुलसी सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। उन्होंने तुलसी साहित्य का अनुशीलन एवं अध्ययन किया है। इसके अलावा रामदेव प्रसाद सोनी अखिल मानस समिति के अध्यक्ष भी हैं। संवाद