डॉक्टर ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि डॉक्टर ने व्यक्तिगत रूप से एक बेटी का नमूना लेते हुए हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला से डीएनए टेस्ट कराया है। इसमें वह उसका जैविक पिता नहीं है। कोर्ट ने रिपोर्ट को कचरा बताते हुए कहा कि भरण पोषण से बचने के लिए डीएनए टेस्ट की नौटंकी नहीं चलेगी, क्योंकि यह रिपोर्ट याची ने अपनी व्यावसायिक पहुंच का इस्तेमाल करते हुए हासिल की है।
कोर्ट ही करा सकता है डीएनए जांच
कोर्ट ने कहा, असाधारण परिस्थितियों को देखते हुए कोई कोर्ट ही डीएनए जांच का आदेश दे सकती है। अगर सबको इसकी स्वतंत्रता दे दी गई तो पितृत्व को चुनौती देने के लिए भानुमति का पिटारा खुल जाएगा। सामान्य रूप से ऐसी जांच की मांग करना पत्नी और बच्चों का अपमान है। कोर्ट ने कहा कि डीएनए टेस्ट अंतिम उपाय होना चाहिए। यह पति की जिम्मेदारी है कि वह साबित करे कि शारीरिक या किसी अन्य कारण से वह पत्नी के साथ संबंध में नहीं था। वह चाहे तो अन्य सबूतों से पत्नी के चरित्रहीन होने को साबित कर सकता है, केवल डीएनए टेस्ट से नहीं।