चार दिन पहले मथुरा में हुए भारी बवाल और उसमें शहीद हुए एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी व एसंओ संतोष यादव के मामले से भी खाकी ने सबक नहीं लिया। मंगलवार को रहिमापुर तिराहे पर चक्काजाम और उसके बाद हुए बवाल के लिए कहीं न कहीं खाकी जिम्मेदार है। बवाल की आशंका तो दो दिन से ही बनी हुई थी। शायद यही वजह रही कि रविवार से ही पूरे गांव को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया था। इसके बावजूद ग्रामीणों ने सड़क पर शव रखकर अपनी पूरी मनमानी की।
रविवार को ज्ञानचंद्र की नैनी जेल के बाहर हुई हत्या के बाद ही झूंसी में बवाल की पूरी संभावना बन गई थी। यही वजह रही कि पुलिस के आला अफसरों ने चंद घंटों में ही पूरे गांव को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया। मारे गए ज्ञानचंद्र के घर के बाहर भारी पुलिस फोर्स के साथ ही पीएसी की एक टुकड़ी भी तैनात कर दी गई। आईपीएस गणेश शाहा के अलावां एसपी गंगापार समेत कई आला अधिकारी इलाके पर अपनी नजर रखे रहे। दूसरे दिन पोस्टमार्टम के बाद ज्ञानचंद्र का शव आने से पहले आरफ भी मौके पर बुला ली गई। सोमवार की दोपहर तकरीबन साढ़े तीन बजे शेरडीह गांव पहुंचा। तब से लेकर अगले कई घंटे तक पुलिस के अफसरों को यही नहीं पता चल पाया कि शव को अंतिम संस्कार अभी होगा या फिर अगले दिन सुबह। शाम तकरीबन साढ़े सात बजे परिजनों ने अपनी विभिन्न मांगों को बताकर शव का अंतिम संस्कार करने से इंकार कर दिया।
मंगलवार की सुबह भारी पुलिस फोर्स की मौजूदगी में शव को घर से उठाया गया। इसके बावजूद ग्रामीणों ने झूंसी-सहसों मार्ग पर रहिमापुर तिराहे पर पहुंचकर शव रखकर चक्काजाम कर दिया। इस दौरान पुलिस के अफसर और कई थानेदार भी चुपचाप खड़े रहे। किसी ने शव को रखकर चक्काजाम से रोकने की हिम्मत नहीं जुटाई। देखते ही देखते कुछ देर में पूरा इलाका जंग का मैदान बन गया। आईपीएस समेत कई थानेदार व सिपाही ग्रामीणों के आक्रोश को शिकार होकर खून से लथपथ हो गए। वो भी तब जबकि पुलिस को इस बात का इनपुट था कि तकरीबन ग्यारह साल पहले यहीं के प्रधान रहे योगेंद्र यादव उर्फ बच्चा की हत्या के बाद गांव कई दिनों तक जलता रहा था। पुलिस ने इसके पहले हुई इसी गांव में हुई घटना से सबक नहीं लिया।