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44 लाख की लूट-कत्ल में पुलिस का खेल उजागर 

Sat, 05 Nov 2016 02:05 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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साइबर क्राइम - फोटो : डेमो फोटो
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 आपराधिक वारदातों के खुलासे में पुलिस द्वारा घालमेल नई बात नहीं है और अब ममफोर्डगंज में कैश डिलेवरी वैन के दो गार्ड की सरेआम कत्ल के बाद 44 लाख की लूट में भी पुलिस का खेल उजागर हुआ है। पांच साल पुरानी इस वारदात में पुलिस ने जांच में दूसरे जिलों के तीन बदमाशों के नाम खोले, लेकिन एक भी रुपया बरामद नहीं किया क्योंकि खुलासा ही फर्जी था। हद यह कि पुलिस ने उस अपराधी को भी लूट में शामिल दिखाया जो घटना से चार साल पहले से छत्तीसगढ़ की जेल में बंद था। वह वारदात के दौरान और बाद में भी जेल के अंदर था। शिकायत पर डीआईजी ने मामले की जांच सीओ से कराई तो सनसनीखेज हत्याकांड का पर्दाफाश करने में पुलिस का फर्जीवाड़ा खुलकर सामने आ गया।
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लुटेरों के दुस्साहस से स्तब्ध थी पुलिस भी 
14 अक्तूबर 2011 को दोपहर सवा बारह बजे का वाकया है। ममफोर्डगंज में फौव्वारा चौराहा के निकट एचडीएफसी बैंक एटीएम के सामने कैश डिलेवरी वैन के सिक्योरिटी गार्ड्स को गोलियां मारकर बदमाश 44 लाख रुपये से भरा बक्सा लूटकर फरार हो गए। दो बाइक पर चार बदमाशों ने बमुश्किल एक मिनट में यह वारदात कर डाली। गोलियां लगने से गार्ड सत्यप्रकाश द्विवेदी और भागीरथी तिवारी की मौत हो गई। दो कर्मचारी जख्मी हुए। मौके पर पहुंचे पुलिस अफसर भी लुटेरों के दुस्साहस से स्तब्ध थे। क्राइम ब्रांच और पुलिस के साथ ही एसटीएफ ने भी लुटेरों की तलाश में पूरा जोर लगाया लेकिन कुछ भी पता नहीं चला। बाद में इस घटना की विवेचना कर्नलगंज थाने से क्राइम ब्रांच को स्थानांतरित कर दी गई।

एक पैसा बरामद नहीं, फर्जी खोले गए नाम
क्राइम ब्रांच में इस वारदात की विवेचना इंस्पेक्टर अब्दुल सत्तार, इंस्पेक्टर लालाराम वर्मा, इंस्पेक्टर (सेवानिवृत्त) रामसागर रावत ने की। घटना के चार साल बाद 2015 में जांच अधिकारियों ने इस घटना का गुपचुप ढंग से खुलासा कर लूट में कौशलेश उर्फ कौशलेंद्र, दयानंद मिश्र, फैजाबाद जेल में बंद जिया खां, अंबेडकर नगर में टांडा के मोइन खां उर्फ बबलू के नाम खोल दिए। बबलू खां अब तक फरार है। बाकी बदमाशों से पूछताछ के बाद जांच अधिकारियों ने लिखा कि उन्होंने जुर्म नहीं कुबूला। ऐसे में लूटे गए 44 लाख रुपये में एक पैसा नहीं बरामद किया जा सका। चौंकाने वाली बात यह कि लूट में शामिल दिखाया गया एक अपराधी दयानंद मिश्र 26 नवंबर 2007 से 22 नवंबर 2011 तक छत्तीसगढ़ की जेल में बंद था। यानी ममफोर्डगंज में लूट और कत्ल से चार साल पहले से घटना के सवा महीने बाद तक वह जेल में था। मगर जांच अधिकारी रामसागर रावत ने उसे लूट में घटनास्थल पर मौजूद दिखा दिया। साफ है कि सनसनीखेज लूट और दोहरे कत्ल का फर्जी खुलासा किया गया। पैसों की बरामदगी नहीं होने तथा फर्जी फंसे दयानंद मिश्रा की शिकायत पर डीआईजी रेंज ने सीओ थर्ड कृष्ण गोपाल सिंह को तफ्तीश सौँपी। सीओ ने जांच रिपोर्ट में लिखा है कि घटना की विवेचना में लापरवाही बरती गई। रिटायर्ड इंस्पेक्टर रामसागर रावत समेत दो विवेचक बयान के लिए सीओ के पास आए ही नहीं। इसमें अफसरों की भी उदासीनता रही क्योंकि उनके पर्यवेक्षण में बदमाशों के नाम खोले गए। हालांकि सीओ ने जांच रिपोर्ट में किसी को दोषी नहीं ठहराया।
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