शहर के कसारी-मसारी इलाके में 1960 में जन्मे अतीक अहमद का राजनीतिक ही नहीं आपराधिक इतिहास भी बहुत पुराना है। हाजी फिरोज के दो बेटों में बड़े अतीक पर पहला मुकदमा 1979 में दर्ज हुआ था। उस वक्त अतीक की उम्र महज 19 साल की थी। हत्या के इस मुकदमे से शुरू हुए आपराधिक सफर के दौरान अब तक उनके खिलाफ छोटी बड़ी धाराओं में लगभग सवा सौ मुकदमे दर्ज हो चुके हैं।
1979 में अपराध की दुनिया में उतरे अतीक अहमद ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। खुल्दाबाद थाने में उनकी हिस्ट्रीशीट खुली है, जिसका नंबर 39 ए है। हत्या, हत्या का प्रयास, लूट, छिनैती, डकैती, धमकाना, गुंडा टैक्स, जमीन कब्जा समेत शायद ही कोई संगीन धारा हों, जिसमें अतीक के खिलाफ मुकदमा न दर्ज हुआ हो। उनके खिलाफ कई बार गुंडा टैक्स और गैंगस्टर एक्ट के तहत पुलिस ने कार्रवाई की। 1985 में पहली बार उनके खिलाफ गुंडा एक्ट का मामला दर्ज हुआ था। जिले में खुल्दाबाद, धूमनगंज, करेली, सिविल लाइंस, कीडगंज, मुट्ठीगंज, शाहगंज, कोतवाली समेत एक दर्जन से अधिक थानों में अतीक के खिलाफ मुकदमे दर्ज हैं। कौशांबी के थानों को जोड़ दिया जाय तो यह संख्या में डेढ़ दर्जन के आस पास पहुंच जाती है। अब तक लगभग सवा सौ मुकदमे अतीक के खिलाफ दर्ज हो चुके हैं।
अतीक अहमद गिरोह को पुलिस ने सूचिबद्ध गिरोह के रूप में पंजीकृत किया है। पुलिस फाइलों में अतीक अहमद गिरोह को आईएस 227 के नाम से जाना जाता है। जब इस गिरोह को सूचिबद्ध किया गया तो उस समय अतीक समेत इसके सदस्यों की संख्या 139 थी। राजू पाल हत्याकांड के बाद यह संख्या डेढ़ सौ के करीब पहुंच गई थी। हालांकि कई लोगों की मृत्यु के बाद अब इसके सदस्यों की संख्या 137 बची है। चूंकी गिरोह अंतरप्रांतीय है इस कारण किसी भी प्रदेश की पुलिस गिरोह के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है।