स्वामी अवधेशानंद, आचार्य महामंडलेश्वर जूना अखाड़ा।
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जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद सरस्वती ने बुधवार को ज्ञान, भक्ति और वैराग्य पर विस्तार से रोशनी डाली। सेक्टर-18 स्थित अपने प्रभु प्रेमी संघ शिविर में श्रीमद भागवत कथा के प्रसंगों के विवेचन में उन्होंने कहा कि भजन के बिना सुख-शांति की प्राप्ति संभव नहीं है।
स्वामी अवधेशानंद ने कहा कि कथा का फल वही है जो समस्त प्रकार के भ्रम, भय, संशय का निवारण कर हमें एकात्मकता का अनुभव कराए है। भगवान का साकार रूप संत ही हैं। देव और पितरों का आशीर्वाद, मनुष्य के पुण्य कर्म जब फलित होते हैं, तब ही जीवन में संत अथवा गुरु का आगमन होता है। कथा के प्रथम स्कंध में प्रवेश करते हुए गुरुदेव ने कहा कि प्रणाम, लोकाचार, शिष्टाचार और सदाचार की प्रथम अभिव्यक्ति है, इसलिए आओ सब मिलकर गुरु को प्रणाम करें।
सत्संग का महत्व परिभाषित करते हुए श्लोक पढ़ा कि- सत्संगत्वे निस्संगत्वं, निस्संगत्वे निर्मोहत्वं। निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः। यानी सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से विवेक, विवेक से स्थिर तत्त्वज्ञान और तत्त्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति अथवा जीवन की मुक्ति होती है।
उन्होंने कहा कि एक साधक के लिए आध्यत्मिक गलियारे में प्रथम साधन श्रवण है। सर्वप्रथम हमें श्रोत्रिय ब्रम्हानिष्ठ सदपुरुषों को सुनना आना चाहिए। मानव देह प्राप्त होना भगवदीय अनुग्रह ही है, उस के बाद यदि आप मुमुक्षु हैं और आप को कृपा से गुरु का सानिध्य प्राप्त है तो निःसंदेह आप का कल्याण निश्चित है।