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चुनिंदा संतों को शाही सुविधाएं कल्पवासियों को एक नल का भी टोटा

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चुनिंदा संतों को शाही सुविधाएं,कल्पवासियों के लिए नल का भी टोटा क्रासर करोड़ों रुपयेे के बजट के बाद भी सैकड़ों संस्थाओं को नहीं मिली बसने की सुविधा, टेंट-कनात और नल के लिए भटक रहे संत-कल्पवासी अमर उजाला ब्यूरो प्रयागराज। कोरोना संक्रमण की वजह से इस बार सैकड़ों संस्थाएं आध्यात्मिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के माघ मेले के आयोजन से दूर रहने के बावजूद आम श्रद्धालुओं की सुविधाओं में भारी कटौती कर दी गई है। माघ मेले में अबकी 30 फीसदी शिविर लगेे ही नहीं हैं। इसके बाद भी संगम की रेती पर आतिथ्य सत्कार से लेकर सेवा भावना से भारतीय संस्कृति का संदेश देने वाली संस्थाओं को टेंट-कनात के लिए भटकना पड़ रहा है। कहा जा रहा है कि चुनिंदा बाबाओं को तो शाही सुविधाएं दे दी गई हैं, लेकिन सामान्य संत और कल्पवासी एक नल, दरी, तख्त और टिन घेरा के लिए मेला दफ्तर की परिक्रमा करतेे थक गए हैं। सेक्टर पांच में संगम लोअर मार्ग पर प्रयागराज सेवा समिति तो भूमि आवंटित कर दी गई है। लेकिन सुविधाएं अभी तक नहीं मिली हैं। इस संस्था की ओर से इस बार के माघ मेले में द्वादश माधव की झांकी सजाई जानी है। पांच दिन तक द्वादश माधव की पूजा-आरती के विशेष आयोजन होने हैं, लेकिन सुविधाएं न मिलने से शिविर अभी तक नहीं लग सका है। इस संस्था के संचालक तीर्थराज पांडेय बच्चा भैया भाजपा सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के महानगर संयोजक भी हैं। वह कहते हैं कि इस बार जैसी गड़बड़ी और उदासीनता कभी भी मेले में सामने नहीं आई थी। इसके पीछे की वजहों की जांच कराई जानी चाहिए, ताकि सचाई सामने आ सके। इसी तरह जगदगुरु घनश्यामाचार्य को भी सुविधा के नाम पर एक टिन घेरा या कनात तक नहीं मिला। मजबूर होकर उन्होंने अपनी जेब से रकम खर्च कर किराये पर टेंट मंगवाकर शिविर लगाया है। इसी तरह परी अखाड़े की स्वयंभू शंकराचार्य त्रिकाल भवंता लगातार पांच दिन तक मेला कार्यालय पर धरना देकर थक चुकी हैं। उन्हें भी पंडाल, टिन घेरा नहीं मिला। धरना प्रदर्शन के बाद एक नल और कपड़े का शौचालय दिया गया। वह कहती हैं कि आखिर मेले में आने वाली साध्वियां और भक्त कहां और कैसे रहेंगे, इसे लेकर बड़ी हैरानी है। अब वह भक्तों को फोन कर मेले में आने से मना कर रही हैं। उनकी चिंता है कि बाहर से लोग आए तो वह ठहराएंगी कहां।  माघ मेले में आने वाले संतों, कल्पवासियों को भूमि और सुविधाएं सरकार की ओर से ही दी जाती रही है। पिछले वर्ष के माघ मेले की तरह ही इस बार भी माघ मेले का बजट 59 करोड़ रुपये है। पांटून पुल, चकर्ड प्लेट मार्ग, बिजली, पेयजल के अलावा तंबुओं की नगरी इसी बजट से बसाई जानी थी, लेकिन मेला शुरू होते ही सुविधाओं के नाम पर मिलने वाला बजट कहां गया, इसे लेकर अबसवाल खड़े होने लगे हैं। कोट सुविधाओं में कटौती कितनी और किन वजहों से की गई है, इसकी जानकारी ली जा रही है। ताकि उचित कदम उठाया जा सके। अरविंद कुमार चौहान, प्रभारी मेलाधिकारी।
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