वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पर ट्वीट करने के मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने की मांग वाली अपील पर बुधवार को सुनवाई होगी। मामले में निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। आगरा सत्र न्यायालय ने प्राथमिकी दर्ज करने की मांग वाली अपील को खारिज कर दिया था। यह अपील मुकेश कुमार चौधरी द्वारा दायर की गई है।
अपील में दावा किया गया है कि आगरा कोर्ट इस तथ्य पर ध्यान देने में विफल रही कि रजत शर्मा ने आईपीसी की धारा 504, 510, 124 और आईटी अधिनियम की धारा 66, 67 अधिनियम और धारा 3 (1) (त) के तहत एक संज्ञेय कार्य किया था। 6 जुलाई 2021 को एक ट्वीट कर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को निम्न/छोटी जाति के रूप में संबोधित किया है। ट्वीट में लिखा था कि ‘कल मोदी के मंत्रिमंडल के विस्तार में 25 से ज्यादा ओबीसी, एससी और एसटी के चेहरे दिखाई देंगे। 20 छोटे-छोटे वर्गों के लीडर्स को जगह दी जाएगी। पिछड़े और बदहाल समाज के कई नेता मंत्री बनेंगे।’
अपीलकर्ता ने दावा किया है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग की निचली जाति के रूप में प्रस्तुति अपमानजनक, आपत्तिजनक और भारत के संविधान द्वारा निषिद्ध है और ऐसा खुले मीडिया में किया गया है। कथित ट्वीट को देखने के बाद अपीलकर्ता की भावना चोट लगी थी। अपीलकर्ता ने आगरा कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए रजत शर्मा, उनकी पत्नी (ऋतु धवन) और मनीष माहेश्वरी ट्विटर इंडिया के पूर्व प्रमुख के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के लिए हाईकोर्ट से निर्देश देने की भी मांग की है।
आगरा सत्र न्यायालय ने इस आधार पर अपील खारिज कर दी थी कि कथित ट्वीट शर्मा के भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के दायरे में आता है और यह किसी का अपमान नहीं करता है। न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि ऐसा प्रतीत होता है कि अपीलकर्ता ने सस्ते प्रचार की मांग करते हुए न्यायालय के समक्ष याचिका दायर की थी।