इसके अलावा बड़ी संख्या में ऐसे प्राचार्यों ने इस्तीफा दिया है, जिनका प्रबंधन से विवाद हो गया था। उच्च शिक्षा निदेशालय के सूत्रों का कहना है कि स्थायी प्राचार्यों की नियुक्ति से पहले ज्यादातर कॉलेजों में कार्यवाहक प्राचार्य तैनात थे, जिन पर प्रबंधन आसानी से दबाव बना लेता था। नई नियुक्ति होने के बाद कई मामले सामने आए, जिनमें प्रबंधन और प्राचार्यों के बीच किसी मुद्दे पर तनाव हो गया और इसकी शिकायत निदेशालय तक पहुंची।
वहीं, कई मामलों में कॉलेज आवंटन के बाद प्राचार्य जब ज्वाइन करने पहुंचे तो प्रबंधन ने उन्हें ज्वाइन नहीं कराया। ऐसे मामलों में सीधे निदेशालय को हस्तक्षेप करना पड़ा। मेरठ के एक काॅलेज में प्रबंधन और प्राचार्य के बीच तनातनी इतनी बढ़ गई कि प्रबंधन ने प्राचार्य को निलंबित कर दिया और बाद में निलंबन से बहाल होने पर प्राचार्य ने कॉलेज से इस्तीफा देकर अपने पुराने कॉलेज में ही ज्वाइन कर दिया।
इन तमाम कारणों से अशासकीय महाविद्यालयों में प्राचार्यों के 60 से अधिक पद खाली हो चुके हैं। प्राचार्य के पद रिक्त होने के बाद अब नए सिरे से भर्ती होगी, लेकिन इसमें अभी वक्त लगेगाा। नए शिक्षा सेवा चयन आयोग का अब तक गठन नहीं हुआ है और अशासकीय महाविद्यालयों में प्राचार्य के पद पर भर्ती अब नए आयोग के माध्यम से ही होगी।