संगीत में शार्टकट नहीं अपनाना चाहिए। उन्होंने खुद का उदाहरण दिया। बताया कि वह अभी भी तीन गुरुओं शेखर सेन, पं. श्रीकांत बाडकर और तूलिका घोष से सीखकर शास्त्रीय रागों का रियाज रहे हैं। आज के दौर के युवा गिटार हाथ में लेकर कुछ लोगों की टीम के साथ बैंड बनाकर घूमने लग जा रहे हैं।इस दौर में यही हो रहा है। गिटार लेकर कुछ लोगों के साथ इंस्टाग्राम, फेसबुक पर कुछ लाइक बटोर लेना और संगीत की बारीकियां सीखना दोनों अलग बातें हैं।
बॉलीवुड के इस समय के संगीत को वह कंफ्यूज कर देने वाला बताते हैं। उनका कहना है कि इरशाद कामिल, अमित भट्टाचार्य समेत कई गीतकार अच्छा लिख रहे हैं, लेकिन संगीत में भी एक खास किस्म की बमबाजी का दौर चल रहा है। पहले एक वर्ष में 20-25 फिल्में रिलीज होती थीं।
एक फिल्म में चार से पांच गाने होते थे। लेकिन, अब हर शुक्रवार को 25 से अधिक फिल्में रिलीज हो रही हैं। एक फिल्म में छह गाने भी आए तो हर हफ्ते तीन सौ गाने आ रहे हैं। इस वजह से भी लोग ऐसे गीतों को सुनने से ऊब रहे हैं। भविष्य की योजना के बारे में पूछने पर वह कहते हैं कि ऐसा संगीत रचने की ख्वाहिश है कि मरने के बाद आने वाली पीढ़ी उनके गीतों से सीख लेकर कुछ काम कर सके।