शहर के धूमनगंज थाने के गंगा किनारे स्थित कबीर आश्रम, कबीर नगर के 46 वें वार्षिक सत्संग समारोह के दूसरे दिन की शुरुआत संत कबीर साहेब की मौलिक रचना 'बीजक' के पाठ से शुरू हुई। तत्पश्चात छत्तीसगढ़ से आए भजन गायक श्रीमान गुरुशरण साहू जी ने कबीर साहेब का प्रसिद्ध पद हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या! प्रस्तुत कर पूरी सभा को मंत्रमुग्ध कर दिया।
कबीर आश्रम, नरसिंहपुर (मध्य प्रदेश) से आई साध्वी सुमेधा साहेब ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि सद्गुरु कबीर साहेब राष्ट्रीय एकता और अखंडता की मिसाल हैं। उनकी वाणियों में सत्य, अहिंसा, प्रेम, भाईचारा और समन्वय प्रमुख रूप से है। वे जाति और धर्म के नाम पर आदमी-आदमी में बंटवारे के बिलकुल खिलाफ थे तथा सबके अंदर विराजमान आत्मा की एकता की बात किया करते थे।
कबीर ब्रह्मचारिणी आश्रम, छत्तीसगढ़ से आई साध्वी सुमन साहेब ने देश के युवा पीढ़ी के नशा और फैशन के नाम पर भारतीय संस्कृति और सभ्यता की मौलिक धारा से भटकने पर अफसोस जताया और कहा कि संत कबीर साहेब के चिंतन को सही तरीके से समझ कर कोई भी, कभी भी अपने जीवन को मानवीय सद्गुणों से सवांरते हुए जीवन के सर्वोच्च शिखर परम आनंद को हासिल कर सकता है।
कबीर ब्रह्मचारिणी आश्रम, वडोदरा से पधारी हुई साध्वी प्रमुख विजया साहेब ने जीवन के मर्म को उजागर करते हुए कहा कि जब तक मनुष्य अपने स्वभाव को नहीं सुधारेगा, तब तक कोई भगवान किसी का भला करने वाला नहीं है। स्वभाव सुधार कर, संस्कार पूर्वक जीना ही मनुष्य होने का पहला लक्षण है। फिर सद्गुरु संतों का सानिध्य प्राप्त कर सेवा, सत्संग और स्वाध्याय से मनुष्य अमरता को भी प्राप्त कर सकता है।
कबीर पारख आश्रम, सूरत से पधारे और मंच संचालन कर रहे संत श्री गुरुभूषण साहेब जी ने कबीर साहेब की साधना को सहज साधना बताया और कहा कि जीवन में हमें अपने हर कृत्य के प्रति परिणामदर्शी होना चाहिए। हमें जीवन में सुख और शांति चाहिए तो सारे व्यवहार के परिणाम में इसे देखना चाहिए। हमें ऐसा कोई काम करना नहीं चाहिए जिसके परिणाम में दुख, पीड़ा और अशांति का अनुभव हो। इसी समझ को जीना ही ध्यान है।
कबीर आश्रम, इटावा (उत्तर प्रदेश) से पधारे हुए संत श्री रतन साहेब जी ने अपने उद्बोधन में बताया कि हमें हाथ पैर हाथ धरकर भगवान भरोसे नहीं बैठे रहना है बल्कि अपनी आत्मा की आवाज सुनकर सही और सफल पुरुषार्थ करना चाहिए। आत्मा रूपी परमात्मा हमारे भीतर विराजमान है उसे हम जब तक विवेक-ज्ञान और साधना-भक्ति से नहीं जानेंगे तब तक बाहर नदी, पहाड़, पेड़, पत्थर में भटकते हुए आकाश में ही परमात्मा को ढूंढते रहेंगे।
कबीर पारख संस्थान, प्रयागराज के वर्तमान प्रमुख संत श्री धर्मेंद्र साहेब जी ने अपार जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि सद्गुरु कबीर साहेब मानवता के मसीहा, प्रेम के पुजारी, राष्ट्र के सजग प्रहरी एवं विलक्षण प्रतिभा संपन्न महान चेतना के सम्राट संत थे। यदि आज सद्गुरु कबीर साहेब फिर से धरती पर आ जाएं तो मनुष्यों के भीतर वैमनष्य, जातिवाद संप्रदायवाद के नाम पर बंटवारे को देखकर सबको जमकर फटकारेंगे।
कबीर साहेब ने कहा है 'को हिंदू को तुरुक कहावे, एक जिमी पर रहिए!' आगे उन्होंने कबीर साहेब की वाणी 'भाई रे दुई जगदीश कहां से आया, कहु कौने बौराया।' पर मनुष्य की मौलिकता को प्रमाणित करते हुए कहा कि जब सबके शरीर में एक ही प्रकार की हड्डी, पसली, खून, मेद, मांस, मज्जा लगा हुआ है और एक ही प्रकार से जब सब देखते, सुनते, चखते और जीते हैं तो फिर भगवान दो कैसे हो जाएगा।
आगे कहा कि हम सब के भीतर वही चेतन सत्ता समय हुई है, जिसे लोग भगवान, अल्लाह और गॉड कहते हैं। जब सब कुछ एक है, संपूर्ण सृष्टि में एकता स्थापित है तो फिर हम लोग क्यों बंटे हुए हैं और लड़ते हैं। इन्हीं सबके चलते आज घरों में झगड़े हैं और वैश्विक स्तर पर भी युद्ध की आग भड़की हुई है। संत कबीर साहेब को पढ़कर, समझकर और जीकर अपने जीवन को धन्य करते हुए विश्व शांति के लिए काम करना ही हमारा परमदायित्व है।