कोरोना महामारी और लॉकडाउन का वो दौर भुलाया नहीं जा सकता। वर्ष 2020 और 21 में इस महामारी ने देश-दुनिया में हाहाकार मचाया। अनगिनत लोगों ने अपनों के खोने का दंश झेलना। बहुतों ने रोजगार जाने का झटका खाया, मगर हार नहीं मानी। नए रोजगार के लिए अपने कौशल के दम पर अपना नया उद्यम खड़ा किया। आज वे एक मुकाम पर हैं। कुछ ऐसी ही मिसाल अपने शहर और जिले में हैं। जिन्होंने अपने कौशल के सहारे खुद को और अपने क्षेत्र को नई पहचान दी है। विश्व युवा कौशल दिवस पर पेश है आपदा को अवसर बनाने वाले ऐसे ही युवाओं की जुबानी, उनके कौशल की कहानी...
नौकरी में जो सीखा, उससे खुद का कारोबार खड़ा किया
शहर के सासनी गेट पला रोड के उमेश कुमार शर्मा वर्ष 2009 से बंगलुरु की डेक ओवन बनाने की निजी कंपनी में काम करते थे। कोरोना के चलते वर्ष 2020 में उनकी नौकरी चली गई। वे घर लौट आए। परिवार में पत्नी व तीन बच्चे हैं। परिवार पालना था। कब तक घर बैठते। यही सोचकर छोटे भाई रवि संग मिलकर 2021 में खुद की दीपास बेकरी इक्यूपमेंट नाम से फर्म तैयार की और डेक ओवन बनाने का काम शुरू किया। पांच लाख रुपये लगाकर ऑनलाइन प्लेटफार्म पर प्रचार-प्रसार शुरू किया। सबसे पहले श्रीनगर से ऑर्डर आया। अब तक वे 90 से ज्यादा डेक ओवन बना चुके हैं। आज 10 लोगों को उन्होंने रोजगार भी दे रखा है। उमेश बताते हैं कि अब तक सिर्फ बंगलुरु व दिल्ली में ही इनका निर्माण होता था। मगर अब अलीगढ़ तीसरा ऐसा शहर बना, जहां इनका निर्माण शुरू हुआ है। वे सिंगल डेक, डबल डेक व ट्रिपल डेक के ओवन बनाते हैं। जिनकी अलग अलग कीमत हैं। अब वे पिज्जा ओवन भी बनाने लगे हैं। उन्होंने अपने हाथ के बने ओवन की सप्लाई अब तक पूर्वी यूपी, पश्चिमी यूपी, दिल्ली एनसीआर के अलावा गैर राज्यों में जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल व पंजाब तक दी है।
पति की नौकरी छोड़ संभाली कमान, अब 37 लोगों को दिया रोजगार
कुछ ऐसी ही कहानी है पिसावा के गांव डेटा कला की नीलम की। कोविड काल में पति का काम छूट गया। परिवार पर संकट आना शुरू हुआ। बारहवीं पास नीलम राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के तहत स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। गाजियाबाद में सैनिटाइजर व फिनाइल बनाना सीखा और इसके बाद अपनी जमा पूंजी लगाकर खुद का काम शुरू कर दिया। कोविड के दौर में सैनिटाइजर की खूब डिमांड हुई। मगर धीरे-धीरे उनके बनाए फिनाइल की आज खूब मांग है। हालांकि शुरुआत में कच्चे माल की समस्या सामने आई थी। मगर अधिकारियों के स्तर से मदद मिलने लगी। जिससे बात बन गई। इसके लिए नीलम ने 25 हजार रुपये का ऋण भी लिया था। उन्हें सफल होता देख गांव की अन्य महिलाएं उनसे जुड़ीं। आज उनके समूह में 40 करीब महिलाएं हैं। प्रत्येक महिला 10 से 15 हजार रुपये तक बचत करती है। साथ में क्षेत्र में बहुत सम्मान की नजर से देखा जाता है।
मदद के लिए पहले घर-घर पहुंचाया खाना
सासनी गेट इलाके में निजी स्कूल चलाने वाले राहुल वर्मा भी रोचक घटनाक्रम के तहत रेस्टोरेंट के संचालक बन गए। राहुल बताते हैं कि कोरोना काल में लंबे वक्त तक स्कूल बंद रहा। कुछ परिचित लोग बीमार हुए और कोविड सेंटरों में भर्ती रहे। उनके खाने पीने की आपूर्ति को लेकर समस्याएं आईं। उन दिनों घर में बैठा था, कोई काम भी नहीं था। इसी बीच विष्णुपुरी से ऑनलाइन होम डिलीवरी खाना सिस्टम शुरू किया। सोशल मीडिया पर उसका प्रचार किया। वाजिब कीमत में उच्च गुणवत्ता वाले रेस्टोरेंट स्तर के खाने की सप्लाई अस्पतालों में मरीजों और घरों में करनी शुरू की। उद्देश्य ऐसा नहीं था कि इसे आगे भी चलाना है। मगर आज उनका यह दूसरा व्यापार बन गया है। कोविड के दौर के बाद भी उन्हें ऑर्डर मिलते चले गए।