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कब मिलेगी इन 10 समस्याओं से आजादी ?

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अभिषेक शर्मा
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हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। जिले भर में उत्साह है और घर- घर तिरंगा फहराया जा रहा है। मगर उन जनसमस्याओं से कब आजादी मिलेगी, जो हमारी मूलभूत जरूरतें हैं। इस सवाल का जवाब आजादी के 75 वर्ष बाद भी नहीं मिल पा रहा है। साल-दर-साल हर आम व्यक्ति आवाज बुलंद करता रहता है, बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करता रहता है। लेकिन उसकी आवाज दबकर रह जाती है।
जलभराव : 12 लाख से अधिक आबादी वाला शहर प्रतिवर्ष बारिश के समय में जलभराव से जूझता है। हर वर्ष इसके समाधान पर लाखों रुपया खर्च किया जाता है। मगर हालात वही हैं। आखिर कब तक? और क्यों इस समस्या का समाधान नहीं हो रहा? इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
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गंदगी : कहने को शहर ओडीएफ प्लस-प्लस की ओर बढ़ रहा है, मगर गंदगी का आलम ये है कि आज भी शहर के कई अनगिनत इलाके ऐसे हैं, जहां से होकर गुजरते समय नाक व मुंह ढकना पड़ता है। मतलब साफ है कि हम खुलकर जी नहीं सकते। गदंगी से हर दिन दो चार होना पड़ता है। इस पर भी लाखों रुपया खर्च होता है।
दूषित पेयजल : पुराने शहर के कई ऐसे इलाके हैं, जहां या तो पानी आता नहीं और अगर कभी आता भी है तो दूषित होता है। कुछ जगहों पर तो काला व बदबूदार पानी आता है। सासनी गेट के आसपास का इलाका तो ऐसा है कि वहां अब पानी पीने योग्य ही नहीं। घर-घर आरओ लगे हुए हैं।
अतिक्रमण : शहर अतिक्रमण की जद में है। हर कोई इससे परेशान है। हर बार अतिक्रमण हटाने का अभियान चलता है। मगर समस्या फिर ज्यों की त्यों रहती है। लोग अतिक्रमण से जूझते रहते हैं। इसका अभी तक स्थायी समाधान नहीं हो पाया है। इस संबंध में आमजन लगातार आवाज उठाते रहते हैं। ?
जर्जर सड़कें : स्मार्ट बनते शहर की सड़कों के हालात किसी से छिपे नहीं हैं। आलम ये है कि जीटी रोड, आगरा रोड की सड़कों पर आज भी वाहन ऐसे हिचकोले लेते हैं, जैसे किसी जमाने में तांगे में सफर किया जाता था। मगर इस ओर किसी का ध्यान नहीं।
जाम : शहर में स्मार्ट सिटी के तहत ट्रैफिक लाइटें लगवाई गई हैं, मगर अतिक्रमण की वजह से शहर में जाम की समस्या का निदान नहीं हो पाता। स्कूलों की छुट्टी के समय तो हालात ये हो जाते हैं कि वाहन चालकों में मारामारी की स्थिति बन जाती है। इस दिशा में भी कब ठोस कदम उठेंगे, कुछ नहीं कहा जा सकता।
प्रदूषण : प्रदूषण का स्तर अपने जिले का बेहद खराब है। कई ऐसे इलाके हैं, जहां प्रदूषण की वजह से बीमारी और अन्य तरह की समस्याएं हैं। मगर प्रदूषण नियंत्रण विभाग कागजों में ही कार्रवाई करता रहता है। इस समस्या के समाधान पर कब पहल होगी, किसी के पास जवाब नहीं है।
स्वास्थ्य : मंडल मुख्यालय पर दो-दो बड़े अस्पताल हैं। दावा सभी सुविधाओं का किया जाता है। मगर दोनों अस्पतालों की इमरजेंसी रेफरल यूनिट का काम करती हैं। दुर्घटना के किसी भी मामले में वहां से मरीजों को हायर सेंटर या निजी अस्पताल रेफर करने की सलाह देकर चलता कर दिया जाता है। अब आम व्यक्ति निजी अस्पताल में इलाज ले पाए या नहीं, यह जवाब किसी के पास नहीं।
शिक्षा : इस विषय पर अगर गौर करें तो कभी आईएएस,आईपीएस, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक देने वाले शासकीय या अर्द्ध शासकीय इंटर कॉलेजों या बेसिक स्कूलों में बच्चों को दाखिल दिलाना आम आदमी उचित नहीं समझता। निजी विद्यालयों में भारी भरकम फीस के सहारे उसे बच्चों को पढ़ाना मजबूरी होता है और फिर वहां महंगी किताबों का बोझ। इस समस्या से कब और कैसे निजात मिलेगी। किसी को नहीं पता।
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भ्रष्टाचार : सरकारी सिस्टम में जड़ों तक घुसे भ्रष्टाचार से निजात भी बड़ा विषय है। किसी भी आम व्यक्ति को अगर किसी सरकारी दफ्तर में काम है और वह किसी तरह से रिश्वत देकर काम करा ले तो सफल है। अन्यथा वह चक्कर लगाता रहे। कहने को रिश्वत लेना व देना दोनों अपराध हैं। मगर जब काम कराने का यही माध्यम है तो आम व्यक्ति क्या करे।
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