हाजी जी पीपलवाली गली मकदूमनगर, राशिक का मकान मकदूमनगर, राशिद का मकान पीपल के पेड के पास मकदूमनगर, सादाब कामरान बनिया वाली गली मकदूमनगर, आमिर का मकान मकदूमनगर, आकिल के मकान में मंदा गली मकदूमनगर।
मददगार व दस्तावेज बनवाने वाले दलाल रडार पर
रोहिंग्या को यहां ठिकाना बताने वाले, रहने में मदद करने वाले और अवैध रूप से दस्तावेज बनवाने वाले दलाल अब एजेंसियों के रडार पर आ गए हैं। जिन लोगों के मकानों में ये लोग किराये पर रहते पाए गए हैं, उनको कार्रवाई की जद में लाया जा सकता है।
तीन वर्ष से लगातार छापे जारी... गिरफ्तारी
अलीगढ़ शहर में पिछले तीन वर्ष से रोहिंग्या की धरपकड़ के लिए लगातार छापे मारे जा रहे हैं, उनकी गिरफ्तारी भी हो रही है। इनमें से कुछ के पास से शहर के पते का आधार कार्ड, किसी के पास फर्जी तरीके से बना पासपोर्ट तक मिला है। पिछले वर्ष एक गिरफ्तारी के समय में सोना तस्करी का आरोप एक रोहिंग्या पर लगा था, जिसे एटीएस लखनऊ ले गई थी। पुलिस रिकार्ड के अनुसार, शहर से वर्ष 2021 में 19 जुलाई को कोतवाली क्षेत्र से एक, इसी दिन रोरावर से एक, अगस्त में रोरावर से दो, फरवरी से एक गिरफ्तारी हुई थी।
चार वर्ष पहले तक थे एक हजार रोहिंग्या, कइयों ने बनवा लिए पासपोर्ट, आधार कार्ड
खास बात यह है कि अलीगढ़ में चार वर्ष पहले तक एक हजार से अधिक रोहिंग्या थे। एक एनजीओ के सर्वे के अनुसार, ये लोग यहां मीट फैक्टरियों से आजीविका चलाने के लिए आकर रहे। शुरुआत में करीब 25-30 रोहिंग्या वर्क परमिट के आधार पर शहर की मीट फैक्टरियों में काम करने लगे। इन्हें पशु कटान के कार्य में दक्ष माना जाता है। धीरे-धीरे बाकी भी यहां इन्हीं कारखानों में रोजगार पा गए। जब इनके खिलाफ मुद्दा उठा और जांच शुरू हुई तो पता चला कि बहुतों ने यहां आधार कार्ड, वोटर कार्ड, पासपोर्ट, राशन कार्ड आदि तक बनवा लिए। एक समय में चंद परिवार गोंडा रोड के कमेला व गोंडा रोड के बाईपास की मीट फैक्टरियों में ही रहा करते थे। धीरे-धीरे मकदूम नगर में इन्हें ठिकाना मिलने लगा और मीट कारोबार से जुड़े स्थानीय लोगों ने इन्हें अपने घरों में किराये पर रखना शुरू कर लिया। इसके बाद भुजपुरा व शाहजमाल में भी रहे। मगर जब से धरपकड़ शुरू हुई, तब से इनकी संख्या में लगातार कमी आ रही है।