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अब एएमयू के कई विभागों में शैक्षणिक ऑडिट की मांग ने जोर पकड़ा

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कमल शर्मा
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इस्लामी साम्राज्य के हिमायती लेखकों की किताबों पर प्रतिबंध लगाए जाने के बादअब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के इस्लामिक स्टडीज, समाजशास्त्र, इतिहास और राजनीतिक शास्त्र विभागों के पाठ्यक्रम के शैक्षणिक ऑडिट की मांग ने जोर पकड़ लिया है। इस बारे में सोशल एक्टिविस्ट एवं मानुषी की संस्थापक मधु पूर्णिमा किश्वर ने कुलपति प्रोफेसर तारिक मंसूर को पत्र लिखा है। मधु उन 25 बुद्धिजीवियों में शामिल हैं जिन्होंने पहले प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अनुरोध किया था।
पाकिस्तानी या मिस्री लेखकों का नहीं, आतंकियों के प्रेरणास्रोत लोगों का विरोध
पत्र में कहा गया है कि प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में हमने पाकिस्तानी और मिस्र के लेखकों की किताबों को प्रतिबंधित करने के लिए नहीं कहा था। बल्कि उन लेखकों की किताबों को प्रतिबंधित करने के लिए कहा था जोकि आतंकवादियों के प्रेरणास्रोत है और दुनिया भर के आतंकवादी संगठन उन्हें आदर्श मानते हैं। ऐसे लेखक भारत के भी हो सकते हैं। इसीलिए इन विभागों में पढ़ाई जाने वाली किताबों का शैक्षणिक ऑडिट कराने की बात कही गई है। जिस पर कुलपति ने कोई ध्यान नहीं दिया है। यह स्थिति अकेले एएमयू की ही नहीं है बल्कि जामिया मिल्लिया, हमदर्द विश्वविद्यालय तथा अन्य विश्वविद्यालयों और उनसे संबद्ध संस्थानों की है। जो कि युवाओं को इस तरह की शिक्षा के माध्यम से गलत जानकारी दे रहे हैं।
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'कुलपति शैक्षणिक ऑडिट की सिफारिश करें'
मानुषी संस्था की संस्थापक का कहना है कि इन विभागों में पढ़ाई जाने वाली किताबों के शैक्षणिक ऑडिट के लिए कुलपति को चाहिए कि वह भारत सरकार के शिक्षा मंत्री और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से सिफारिश करें। इनके ऑडिट के लिए देश के प्रगतिशील शिक्षाविद और विशेषज्ञों की कमेटी बनाई जाए। जिसमें वामपंथी और कट्टरवादी विचारधारा के शिक्षक शामिल न हों, उसी रिपोर्ट पर यूजीसी पाठ्यक्रमों के बदलाव के बारे में निर्णय ले। जिससे कि युवाओं को इन विषयों के बारे में सही जानकारी मिल सके।
किताबों को हटाने की अधिसूचना नहीं, न ही ठीक से प्रचार किया
मधु किश्वर का कहना है कि उन्होंने पाकिस्तानी लेखक आला अब्दुल मौद्दी और इजिप्ट के लेखक सैयद कुतुब के नाम का उल्लेख नहीं किया था। बल्कि उन सभी के नामों का उल्लेख किया था जो कि आतंकवादियों के आदर्श हैं। लेकिन विश्वविद्यालय के इस्लामिक विभाग ने इन दोनों लेखकों की ही किताबें इस्लामिक स्टडीज विभाग से हटाई हैं। हालांकि इस बारे में विवि की ओर से किसी भी तरह का नोटिफिकेशन तक नहीं किया गया है। इससे सवाल यह है कि क्या इन लेखकों की सभी किताबें हटा दी गईं हैं। किताबों को आनन-फानन हटाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं।
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'एएमयू के पास छिपाने लिए बहुत कुछ'
हम वास्तव में उस जल्दबाजी से हैरान हैं जिसके साथ एएमयू ने मिस्र के विचारक सैयद कुतुब के साथ मौदुदी की बात को हटाने की घोषणा की। हमें उनके लेखन पर आपत्ति नहीं थी। मुद्दा भारतीय बनाम गैर-भारतीय लेखक नहीं था। जिस घबराहट में एएमयू ने किताबें हटाईं उससे साबित होता है कि वह बहुत कुछ छिपा रहा है। नाटकीयता के साथ दी गई इस टोकन रियायत से एएमयू, जामिया और हमदर्द के व्यापक अकादमिक ऑडिट की मांग को खत्म नहीं किया जा सकता।
मधु किश्वर के पत्र के बारे में कोई जानकारी नहीं है, लिहाजा पत्र पर किसी तरह की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हूं।
उमर पीरजादा (पीआरओ एएमयू
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