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‘बड़े भाई’ की हार से चमका नेताजी की सियासी सितारा

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मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को अलीगढ़ की समस्या बताते शहजाद अलवी । फाइल फोटो - फोटो : CITY OFFICE
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देश-प्रदेश की राजनीतिक फलक पर अलीगढ़ की सियासत ने कई दिग्गजों को पहुंचाया है। इनमें एक नाम मुलायम सिंह यादव का भी जोड़ा जाता है। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि अगर चौ. राजेंद्र सिंह 1989 के विधानसभा चुनाव में इगलास सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी चौ. बिजेंद्र सिंह से न हारते तो शायद वह मुख्यमंत्री न बनते।
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इस हार के बाद चौ. राजेंद्र सिंह की दावेदारी मुख्यमंत्री पद के लिए कमजोर हो गई और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। इसके बाद उनका सियासी कद ऐसा बढ़ा कि फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। हालांकि, राजेंद्र सिंह और उनके परिवार के साथ उनके संबंध प्रगाढ़ रहे। मुलायम सिंह उन्हें अपना बड़ा भाई मानते थे। परिवार के हर सुख-दुख में शामिल होते रहे। चौ.राजेंद्र सिंह के देहांत पर खुद मुलायम सिंह यादव उनकी अर्थी को कंधा देने आए थे।
वर्ष 1977 में चौधरी चरण के नेतृत्व में बनी जनता पार्टी की सरकार में दो घनिष्ठ मित्र मुलायम सिंह यादव सहकारिता व पशुपालन मंत्री और राजेंद्र सिंह कृषि और सिंचाई मंत्री बने। इसके बाद 1980 में चौधरी चरण सिंह ने लोकदल पार्टी बनाई। चौ. राजेंद्र सिंह की सिफारिश पर यादव चेहरे के रूप में उसका प्रदेश अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को बनाया।
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इसी साल हुए विधानसभा चुनाव में राजेंद्र सिंह इगलास सीट से चुनाव जीत गए, जबकि जसवंतनगर से मुलायम सिंह यादव चुनाव हार गए। दोनों के बीच प्रगाढ़ संबंध थे। इस नाते राजेंद्र सिंह ने चौधरी चरण सिंह की लखनऊ के माल एवेन्यू स्थित कोठी में मुलायम सिंह यादव के रहने की व्यवस्था कर दी।
पांच-छह महीने के बाद एमएलसी का चुनाव हुआ। राजेंद्र सिंह ने चौधरी चरण सिंह से अनुरोध करके उन्हें एमएलसी बनवाया। यहीं से मुलायम सिंह यादव का सितारा चमकता गया और वह चौधरी चरण सिंह के करीब आ गए।
1985 के चुनाव में मुलायम सिंह और राजेंद्र सिंह जीत कर विधानसभा पहुंचे। बताते हैं राजेंद्र सिंह का विधानसभा क्षेत्र इगलास में स्वागत कार्यक्रम था, जबकि मुलायम सिंह वीवी मौर्या, चंद्रजीत यादव, शरद यादव और एचएन बहुगुणा के साथ दिल्ली में चौधरी चरण सिंह के पास पहुंच गए। चौधरी चरण सिंह से राजेंद्र सिंह का पारिवारिक रिश्ता था। सो, यह चर्चा थी कि चौधरी चरण सिंह अपने खास राजेंद्र सिंह को ही विपक्षी दल का नेता बनाएंगे, लेकिन सबकी सोच गलत साबित हुई। चौधरी चरण सिंह ने मुलायम सिंह को विरोधी दल का नेता बना दिया और राजेंद्र सिंह को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंप दी।
जिले में मुलायम सिंह यादव के करीबी डॉ. रक्षपाल सिंह ने बताया कि 1980 में नेताजी ने उन्हें युवा लोकदल का जिलाध्यक्ष बना दिया। उन्होंने कहा कि वह हमेशा मुलायम सिंह यादव से जुड़े रहे। जब 1987 में प्रदेश में रथ यात्रा निकाली, तब उनका उनकी अगुवाई में स्वागत किया गया। डॉ. रक्षपाल सिंह ने कहा कि वह सपा का भी हिस्सा रहे।
इसी तरह चौ. राजेंद्र सिंह के करीबी रहे योगेश शर्मा बताते हैं कि 89 के चुनाव में चौ. राजेंद्र सिंह मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में शीर्ष पर थे। राजेंद्र सिंह की हार के बाद पार्टी में दो धड़े बन गए। एक मुलायम सिंह को प्रदेश का मुख्यमंत्री तो दूसरा चौधरी अजित सिंह को मुख्यमंत्री बनाना चाहता था।
अजित सिंह ने राजेंद्र सिंह को लखनऊ पहुंचने व विधायकों को एकत्र करने के लिए कहा, लेकिन राजेंद्र सिंह ने कहा कि वह चुनाव हार चुके हैं। ऐसी स्थिति में आपका लखनऊ पहुंचना आवश्यक है और वह भी पहुंच जाएंगे। यहां चौधरी अजित सिंह की अनुभवहीनता सामने आ गई और वह मुख्यमंत्री पद के लिए होने वाले शक्ति परीक्षण वाले दिन ही लखनऊ पहुंच सके, जो मुलायम सिंह यादव के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ।
फिर चौ.राजेंद्र सिंह को बनाया गया था एमएलसी
डॉ. रक्षपाल सिंह व योगेश शर्मा ने बताया, मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में अलीगढ़ में हुए विधान परिषद के चुनाव में राजेंद्र सिंह को जनता दल का टिकट न दिए जाने के लिए लाबिंग हो चुकी थी। ऐसी विषम परिस्थिति में उन्हें (रक्षपाल सिंह), योगेश शर्मा एडवोकेट, चौ. जगवीर सिंह (पूर्व विधायक), चौधरी रामजीलाल, सुरेश वर्मा, चौ. डम्बर सिंह, यशपाल चौहान को राजेंद्र सिंह ने अपने आवास पर बुलाया और कहा कि, वह चुनाव लड़ेंगे।
चार घंटे चली बैठक में चुनाव की रणनीति ऐसी बनी कि पूरी पार्टी ने राजेंद्र सिंह को चुनाव लड़ाया और उनकी ऐतिहासिक जीत हुई, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री ने उन्हें अपनी मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया। इस चुनाव के बाद राजेंद्र सिंह की राजनीति पर विराम लग गया। चौ. राजेंद्र सिंह के देहांत के बाद उनके पुत्र सुनील सिंह एमएलसी बने।
प्रदेश से खत्म हुआ विपक्ष : सुनील सिंह
पिता की राजनीतिक विरासत संभाल रहे लोकदल अध्यक्ष चौ. सुनील सिंह कहते हैं कि 2017 से ही मुलायम सिंह यादव बीमार चल रहे हैं। मैंने तो खुद उन्हें लोकदल का अध्यक्ष पद संभालने की पेशकश की थी। यह बात बिल्कुल सही है कि उत्तर प्रदेश की जमीनी समझ रखने वाले इकलौते नेता मुलायम सिंह थे। उनके राजनीति से अलग थलग होने के बाद से प्रदेश में विपक्ष खत्म सा हो गया। इस चुनाव में यह बिल्कुल स्पष्ट तौर पर देखने को मिला।
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