मंदिरों की छांव में भक्ति और वात्सल्य पलता है। मगर यहां मंदिर के पास मातृत्व की ऐसी दुखद कहानी देखी गई कि लोगों के कलेजे कांप उठे। एक मां दो दिनों तक अपनी दो साल की मुर्दा बच्ची को लेकर घूमती रही। कभी उसे गले लगाती तो कभी गोद में झुलाने लगती। कभी माथा चूमती तो कभी बेशकीमती सामान की तरह बैग में सुरक्षित रख लेती। आसपास के लोग कहते हैं कि यह महिला मानसिक रूप से कमजोर है। तो उसे अपनी बच्ची से टूटकर प्यार करना किसने सिखा दिया? शायद यही प्रकृति है।
महिला की कहानी यह है कि कोई दो साल पहले वह खेरेश्वर मंदिर के आसपास देखी गई थी। किसी ने कुछ दिया तो खा लिया, वरना भूखे पेट ही सो जाती। हालांकि उसके बारे में किसी को कुछ ज्यादा नहीं पता लेकिन खेरेश्वर मंदिर के आसपास के लोगों कहना है कि कभी कभी वह खुद को राजस्थान का निवासी बताती थी। अब वह यहां कैसे पहुंची। कौन लेकर आया। उसके परिवार में कौन कौन है और कहां हैं इसकी जानकारी किसी के पास नहीं है। लोगों ने बताया कि वह जब यहां आई थी तो उसकी गोद में बच्ची थी, जो अब दो साल की हो गई थी।
7 अगस्त को उसकी बच्ची की मौत हो गई। वह एक दुकान के पास बैठी थी, इस दौरान बच्ची के शरीर में कोई हलचल न होती देख, लोगों ने बताया कि बच्ची की मौत हो चुकी है, इसे दफना दो। लेकिन वह इसे मानने को तैयार नहीं थी। लोगों ने बच्ची के शव को लेना चाहा तो वह उसे कंधे पर लेकर चल दी। इसके बाद 8 अगस्त को वह फिर बच्ची के शव को लेकर घूमती दिखी। किसी ने पुलिस को सूचना दी, पुलिस जब तक पहुंची महिला वहां से निकल चुकी थी। इसी दौरान वह झाड़ियों के बीच छिपी दिखी, वहां लोग जमा हुए तो वह पैदल ही गभाना की ओर चल पड़ी।
बाद में उसके पीछे गए ग्रामीणों ने गांव कलुवा में बच्ची का शव उससे लेकर दफना दिया। इसके बाद से वह बच्ची की तलाश में भटकती हुई खेरेश्वर मंदिर के पास पहुंची और लोगों से पूछने लगी कि किसी ने उसकी बच्ची को देखा है क्या, वह यह सच स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि उसकी लाडली अब इस दुनिया में नहीं रही। खेरेश्वर मंदिर के पास रहने वाले कासगंज के मूल निवासी राजबीर सिंह पाल ने बताया कि उसने और आठ-दस अन्य ग्रामीणों ने महिला से बच्ची का शव लेकर गांव कलुवा में दफना दिया है। थानाध्यक्ष लोधा राजबीर सिंह परमार का कहना है कि महिला मानसिक रूप से कमजोर है, उसकी बच्ची की मौत होने पर ग्रामीणों के शव दफनाने की जानकारी मिली है।