केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बार आम बजट में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के बजट में कटौती कर दी है। पिछले साल यह लक्ष्य 89,400 करोड़ था, जिसे अब 60 हजार करोड़ तक सीमित कर दिया है। इसमें करीब 34 फीसद की कटौती की गई है। बजट कम होने का सीधा मतलब श्रमदिवस के कम होने और रोजगार के अवसरों में कमी होना भी है।
नरेंद्र मोदी सरकार पिछले तीन साल से मनरेगा के बजट में कटौती करती चली आ रही है। बजट कम होने से न सिर्फ लगातार श्रमदिवस कम हो रहे हैं बल्कि औसतन 10 फीसद लोगों को मांग के अनुरूप रोजगार और उनका भुगतान भी नहीं दिया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2022-23 में बजट में 25.5 फीसद और 2021-22 में 34 फीसद की कटौती की गई थी। मनरेगा में अधिकांश मजदूरों के रूचि न लेने और दूसरे कामों में ध्यान देने से मनरेगा की उपयोगिता लगातार घट रही है।
मनरेगा उपायुक्त भालचंद्र त्रिपाठी के अनुसार पिछले साल जिले में 33 लाख मानव दिवस थे, जिसका पूरा लक्ष्य जनवरी में ही प्राप्त कर लिया गया है। हालांकि जिले में मनरेगा मजदूरों को न्यूनतम 100 दिन का काम मिलने का लक्ष्य मात्र 10 फीसद तक पूरा किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि जिले में शत-प्रतिशत मजदूरों को काम की मजदूरी मिल चुकी है। मजदूरों को अधिकतम आठ दिन में मजदूरी का भुगतान कराया जा रहा है। उन्होंने बताया कि मनरेगा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने वाला एक प्रमुख औजार है। खासतौर से भूमिहीन श्रमिकों और सीमांत किसानों के लिए यह एक बड़ा सहयोग देने वाला है।
गांव में मनरेगा योजना में काम नहीं मिल पा रहा है, चूंकि श्रमदिवस पहले के मुकाबले काफी कम हो गए हैं। काम मिलने में कठिनाई हो रही है। पहले सिर्फ कच्चा काम करने को मिलता था, अब पक्का काम भी हो रहा है, लेकिन रोजाना काम नहीं मिल पा रहा है। इससे परिवार के भरणपोषण में दिक्कत हो रही है। - श्यामवीर कश्यप
कई माह पहले काम किया था, अब तक भुगतान नहीं हो सका है। सरकार ने बजट में कटौती कर दी है, ऐसे में काम मिलना और भी कठिन होगा। गांव में मांग के अनुरूप काम नहीं मिल पा रहा है। मजबूरी में दूसरे काम करने के लिए शहर या फिर दूसरी जगह जाना पड़ रहा है। - रिंकू प्रजापति