आदत के अक्खड़, तबीयत के फक्कड़ और मन से मस्त-मौला..यही तार्रुफ दिया जा सकता है अजीम शायर शहरयार का। वह मूडी थे। वह शायर ही क्या जो मूडी न हो। मौसम की तरह की उनका मूड बदलता रहता तो शायरी भी खूब उसी पेचोखम से होकर गुजरती। अमूमन फिल्मों की शायरी को कमतर और गैरशायराना तुकबंदी समझ लिया जाता है। मगर शहरयार ने न सिर्फ यह मिथ तोड़ा बल्कि मकबूल होकर दिखाया कि कैसे आला दर्जे की शायरी को फिल्म में पिरोया जा सकता है। एक ही फिल्म में शायरी के इतने मूड, इतने शेड नजर आते हैं कि आप उनके रेंज की दाद दिए बिना नहीं रह सकते।
उमराव जान को ही ले लें एक ओर तो शायर बेहद रूमानी लफ्जों में एलान करता है कि जिंदगी जब भी तेरी बज्म में लाती है हमें..ये जमीं चांद से बेहतर नजर आती है हमें तो दूसरी ओर हताशा के चरम सुर भी गूंजते हैं- ये क्या जगह है दोस्तों.. ये कौन सा दयार है...हद-ए-निगाह तक जहां गुबार ही गुबार है। एक ओर इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं जैसा शोख अंदाज है तो दूसरी ओर जुस्तजू जिसकी थी.. उसको तो न पाया मैंने जैरा नैराश्य है। इसी दरम्यान, उनकी शायरी में.. दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए. बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए जैसी आम फहम जुबां भी मौजूद है। उमराव जान तो शहरयार की फिल्मी शायरी का उरूज है लेकिन वह इससे पहले गमन फिल्म की गजल ..सीने में जलन आंखों में तूफां सा क्यों है से मकबूलियत का स्वाद चख चुके थे। शहरयार की जिंदगी के फलसफे को उन्हीं के एक शेर के जरिए बयां किया जा सकता है- शदीद प्यास थी, फिर भी न छुआ पानी को...मैं देखता रहा दरिया तेरी रवानी को।
बरेली में जन्मे, अलीगढ़ का होकर रह गए
दुनिया भर में अपनी शायरी से अलीगढ़ को प्रसिद्धि दिलाने वाले अखलाख मुहम्मद खान उर्रफ शहरयार का जन्म 16 जून 1936 को आंवला, बरेली में हुआ था। बेशक वह जन्मे बरेली में थे लेकिन तालीम की नगरी अलीगढ़ का होकर रह गए। एएमयू में पढ़ाई के साथ ही वह लंबे अरसे तक उर्दू के शिक्षक भी रहे। उनको शायरी के मैदान में योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इनमें ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार विशेष हैं। देश-विदेश में राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मुशायरों में उनकी मौजूदगी को कामयाबी की जमानत माना जाता था। चुनिंदा फिल्म (उमराव जान, गमन, फासले) में उनके लिखे गीत गजल बेहद मशहूर हुए। गीतकार-संगीतकार जॉनी फॉस्टर के लिखे कौमी एकता और सामाजिक सद्भाव के संदेश देते गीतों के एलबम को एएमयू के कैनेडी हॉल में शहरयार ने लॉन्च किया था। 13 फरवरी 2012 अलीगढ़ में शहरयार ने दुनिया को अलविदा कह दिया था।
बेबदन जिस्म से मिलने आए हो तुम...इस नज्म का पहला श्रोता मैं था
-डॉ. प्रेमकुमार
अलीगढ़। ''आज शाम का मिलना पहले से तय था। हमेशा की तरह आने से पहले फोन कर लेने के लिए भी कहा ही गया था। 11.35 पर फोन किया। गजल के सुनाई देने के थमते ही खूब खुश-खुश और कुछ ज्यादा ही दमदार आवाज सुनाई दी- ''नहीं, आज नहीं। आज कोई एकेडमिक काम नहीं होगा। आज मुल्क आजाद है। आज का यह दिन-! पूरी रात जागकर इस्तकबाल किया है आज मैंने नए साल का ।'''''''' झरने की तरह झर-झर करती आती उनकी उस हंसी के बीच मैंने उत्साहित भाव से जानना चाहा ''''''''तो क्या कुछ लिखा भी?'''''''' ''''''''हां, लिखा भी''''''''। शब्द-शब्द पर खूब-खूब बल। इत्मीनान से आहिस्ता-आहिस्ता चबाते-से उनका वह बोलना। बहुत बड़ा और खास कोई काम कर लेने के बाद की-सी प्रसन्नता ''पर जो लिखा है वो अंदर वाले कमरे में है- इधर नहीं लाया हूं कुछ।'' ''कुछ लिखा... वाह! तब तो अलग से बधाई!'' - हां, अभी चल रहा है पर सुन लो तुम।'' मैं सांस रोके सुनने को प्रस्तुत। सुनाने का ऐसा उनका यह मन रोज-रोज तो होता नहीं है- ''बेबदन जिस्म से मिलने आए हो तुम... ।'' खूब खुश-खुश तन्मय होकर तीन-चार पंक्तियां कई बार सुनाई- ''बस... अब फिर।'''''''' चूंकि आज शाम का मिलना टल गया था इसलिए मैंने अपनी एक शंका का समाधान फोन पर ही कर लेना चाहा। शंका कुछ दिन पहले फैज के बारे में उनसे हुई बातचीत में कहे गए एक कथन को लेकर थी- ''''''''वो जो फैज के उस संग्रह के डेडीकेशन वाली बात आपने कही थी... अभी मैंने देखा है, एक जगह तो वो बात तो मजाज के संग्रह ''''''''आहंग'''''''' की है...।'''''''' ध्यान से सुना। तुरंत उत्तर दिया- ''''''''हां-हां, उन्होंने भी किया है-पर वो इतना मशहूर नहीं जितना कि फैज का। फैज ने भी डेडीकेट किया है। उनका पहला कलेक्शन ''''''''नक्शे फरियादी'''''''' या शायद ''''''''दस्तेसबा''''''''- । मखदूम, जज्बी, जाफरी और मजाज इन चार शायरों में से फैज ने अपनी किताब के डेडीकेशन में दो को दस्त-ओ-बाजू और दो को कल्ब-ओ-जिगर लिखा है।''''''''
मैंने कल मिलने के लिए ''''''''हां'''''''' करा लेने के मंतव्य से कहा- ''''''''अच्छा, ठीक है। मैं कल आकर घर मिलता हूं।'''''''' हल्की हंसी की आवाज के साथ कहा गया- ''''''''हां कल की कल देखा जाएगा।'''''''' मैंने उनसे हां कहलवा लेने की एक और कोशिश की- ''''''''फैज वाली इस बातचीत को मैं आज पूरा किए लेता हूं। कल आऊंगा तो उसे भी साथ लेता आऊंगा।''''''''- अच्छा, ठीक है।''''''''
और तब नए साल के पहले दिन की वह पहली प्यारी-सी शाम जमीन पर उतरकर अच्छी-खासी फैल चुकी थी। मैं विभाग से घर जाने को ही था कि उनका फोन फिर आ गया- ''सुनोगे? पूरी हो गई है वो नज्म।''''''''
हां, हां। क्यों नहीं ? जरूर सुनूंगा।'''''''' मैंने झटपट कागज-पेन संभाला- ''''''''बेबदन जिस्म से मिलने आया है तू।''''''''
उन्होंने जान लिया है कि मैं सुन भी रहा हूं और लिख भी रहा हूं। इसलिए संभल-सोचकर एक खास लय में आहिस्ता-आहिस्ता बोला जा रहा है। पूरी सावधानी और सजगता बरतते हुए ''''''''अब अगली लाइन- अब दूसरी लाइन... । हां तो-
बेबदन जिस्म से मिलने आया है तू
और जीने का पैगाम लाया है तू
कितना अहसान है
अपनी आवाज का यह जो जादू है
इससे निकलने न देना मुझे
क्या अजब कैद है
इतना आजाद पहले कभी मैं न था
तेरी सांसों के साए में बैठा हूं मैं
रात धूप में
दाएं जानिब मगर चांद भी है मेरे
चांद की चांदनी और सूरज की इस धूप में
क्यों अकेला हूं मैं
तेरी दूरी की ये कुरबतें हैं मेरे साथ में
होंठ छू सकता हूं?
ऐसा कर सकता हूं
इससे आगे किसी और दिन जाऊंगा
तू यहीं रुक मैं मिलने यहीं आऊंगा ।''
पंक्ति-पंक्ति पर दाद देता सुनता हुआ मैं यहाँ पहुंचकर उनका आभार प्रकट करने के लिए जैसे आकुल हो उठा था- ''जी, नज्म सचमुच बहुत अच्छी है। मुझे इसलिए भी यह याद रहेगी कि मुझे आपने इसका पहला श्रोता बना दिया है।'''''''' अत्यंत संतुष्ट-शिष्ट, धीमी-सी एक हंसी- ''चलो अच्छा है कि तुम्हें अच्छी लगी..।''