एएमयू के हिंदी विभाग के प्रोफेसर शंभुनाथ तिवारी ने कहा कि उन्हें कई भाषाएं जानना चाहिए। मनोवैज्ञानिक भी यह बात सिद्ध कर चुके हैं कि जो जितनी भाषाएं जानता है, उसके सोचने की क्षमता उतनी ही ज्यादा होती है। उनकी कल्पनाशीलता, कार्य करने की क्षमता ज्यादा होती है। डॉ. आरएम लोहिया 16 भाषाएं जानते थे। उन्होंने हिंदी छोड़कर किसी भी भाषा में अपना वक्तव्य नहीं दिया। भाषाएं समृद्ध करती हैं। यह जानकार अचरज होगा कि देश में जितने भी हिंदी के बड़े समर्थक थे, वह सभी हिंदीभाषी नहीं थे। वह चाहे गांधीजी हों या राजा राममोहन राय हों, या बालगंगाधर तिलक हों या सरस्वती दयानंद हों। दूसरी भाषाएं जानकार हिंदी में अच्छा कर सकते हैं। हिंदी को लेकर हीनता का बोध नहीं होना चाहिए, क्योंकि हिंदी साहित्य है और साहित्य को उर्दू में अदब कहते हैं। अदब की जिंदगी में क्या हैसियत होती है, यह हम सब जानते हैं। साहित्य ही अदब सिखाता है। हिंदी व्याकरण को बेहतर करने में अमर उजाला अहम भूमिका निभा रहा है।
अब कुशलता का दौर है : साद
प्रशिक्षण एवं नियोजन अधिकारी एएमयू साद हमीद ने कहा कि आने वाला दौर कुशलता का है, क्योंकि डिग्री से काम नहीं चलने वाला है, जो भी कॅरिअर चुनने जा रहे हैं, उसके बारे में शोध करिए। कॅरिअर को निर्धारित करें, नौकरी झक मारकर पीछे आएगी। उन्होंने कहा कि सभी भाषाओं के लिए नौकरी है। हिंदी को बढ़ावे की जरूरत नहीं है, क्योंकि हिंदी स्वयं एक मजबूत भाषा है। उन्होंने कहा कि जो भी पढ़ाई करें, उसमें उत्कृष्ट बनना पड़ेगा। अपने विषय से प्रेम होना चाहिए। मसलन, हिंदी को खाना है, हिंदी को पीना है, हिंदी को सोना है। हिंदी को लेकर दीवानगी होनी चाहिए। पढ़ाई में आनंद लीजिए। औसत दर्जे का विद्यार्थी बनने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उत्कृष्टता ही सफलता दिलाएगी। अपने विषय के अलावा आसपास घटने वाली घटनाओं की जानकारी होनी चाहिए। सरकारी नौकरी हो निजी संस्थाओं में नौकरी या अपना व्यवसाय करना चाहते हैं, तो अच्छा बोलना और अच्छी लेखनी जरूरी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सभी से सीखने की जरूरत है। जहां ज्ञान मिल रहा है, वहां ले लें। हम चाहते हैं कि आप सभी जिंदगी में कामयाब हों, क्षेत्र चाहे जो भी हो।
खेल के जरिये बना सकते हैं कॅरिअर : मजहर
जिम्नेजियम के वरिष्ठ प्रशिक्षक मजहर उल कमर ने कहा कि खेल के जरिये ही अपना कॅरिअर बना सकते हैं। एएमयू में बिहार और यूपी बोर्ड से विद्यार्थी आते हैं। हिंदी की दिल की भाषा है। संस्कृति की भाषा है। संवेदना की भाषा है। जीने की भाषा है। समाज को जोड़ने की भाषा है। एक अच्छा खिलाड़ी होने के लिए इन्हीं गुणों का होना आवश्यक है। एक अच्छा और स्वस्थ समाज बनाना है तो उसकी मातृभाषा को यह जिम्मेदारी उठानी होगी। सरकार की भी जिम्मेदारी है कि मातृ भाषा को तवज्जो दे, क्योंकि जब मातृ भाषा को रोजगार नहीं जोड़ते तो उससे लोग दूरी बनाने लगते हैं। उन्होंने कहा कि दर्जनों ऐसे खेल प्रबंधन के पाठ्यक्रम संचालित हैं, जिसमें रोजगार बना सकते हैं। खेल प्रबंधन की किताबें ज्यादातर अंग्रेजी में हैं, जो खिलाड़ियों को पढ़ने में दिक्कतें होती है, क्योंकि वह ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं। इसलिए इन किताबों को हिंदी में अनुवाद कर दिया जाए, तो बेहतर है। यह कार्य हिंदी के शोधार्थी कर सकते हैं। प्रशिक्षण के लिए सबसे ज्यादा जरूरी भाषा की होती है और मातृभाषा आसानी से समझ में आती है।