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कुम्हारों को आस, इस बार मनेंगी उम्मीदों की दीपावली

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चाक पर दीपक तैयार करते कुम्हार भगत सिंह। संवाद - फोटो : CITY OFFICE
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दीपावली पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों के चाक पूरी गति से चल रहे हैं। केंद्र सरकार के चीन से निर्मित सामान के देश में आने पर लगाई गई रोक से मिट्टी का सामान बनाने वालों को भरोसा है कि इस बार उनके बनाए गये दीपक, मटकी आदि की खूब बिक्री होगी। दीपावली पर मिट्टी के दीपक जलाने का विशेष महत्व माना जाता है।
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त्योहार पर बढ़ गई है व्यस्तता :
शहर में एटा चुंगी, जयगंज, धनीपुर, क्वार्सी, किशनपुर, सारसौल, मैलरोज बाईपास, खैर बाईपास आदि में कुम्हारों की बस्ती इन दिनों काफी गुलजार है। यहां हर घर में दीपावली के लिये चाक पर मिट्टी के दीपक, मटकी आदि बनाने, आग में पकाने और सजाने-संवारने का काम तेजी से चल रहा है। इन घरों में बड़ों से लेकर बच्चे तक दिन-राज मिट्टी का सामान बनाने में जुटे हैं। चाक तैयार करने में आठ से दस हजार रुपये तक की लागत आती है। चाक की मदद से दीपक, घड़ा, करवा, गमला, गुल्लक, मटकी, सुराही व कुल्हड़ बनाए जाते हैं।
मिट्टी को गढ़ने वालों से दूर हो रही धन लक्ष्मी :
मिट्टी गढ़कर उसे आकार देने वालों पर शायद धन लक्ष्मी मेहरबान नहीं है। अनेक परिवार अपने परंपरागत काम को छोड़कर अन्य कामों से अपने परिवार की गुजर-बसर कर रहे हैं। दीपावली पर मिट्टी के सामान तैयार करना उनके लिए अब सिर्फ एक सीजन बनकर रह गया है।
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सोशल मीडिया पर चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की अपील
सीमा पर पड़ोसी देश चीन से बिगड़े संबंधों को लेकर चीनी सामान को प्रतिबंधित कर दिया गया है। देश में निर्मित सामान की दीपावली पर अधिक बिक्री होने की उम्मीद बढ़ चली है। विभिन्न संगठनों की ओर से सोशल मीडिया पर चीनी सामान की बजाय स्वदेशी सामान की खरीदारी करने की अपील शुरू हो चुकी हैं।
सरकार से मदद की दरकरार
मिट्टी लाने एवं दीपक बनाने से लेकर उन्हें पकाने में जो लागत आती है, वह भी ठीक से नहीं निकल पाती है। दीपावली के बाद दो वक्त की रोटी जुटाने के लिये अन्य काम करने पड़ते हैं। इस कला को बचाने के लिए सरकारी मदद मिलनी चाहिए। चार पीढ़ियों से घर में मिट्टी के बर्तन बनाने का काम हो रहा है। अब इस धंधे से कोई फायदा नहीं हो रहा है। अब धंधा बदलने की सोच रहे हैं। मजदूरी से कम से कम 300 रुपये तो मिल ही जाते हैं। - भगत सिंह।
कम हो रहा रुझान
मिट्टी से बने आइटम से लोगों का रुझान कम हो रहा है। इसमें मेहनत व पैसा अधिक लगता है, लेकिन उसका लाभ कम ही मिल पाता है, फिर भी पेट की आग बुझाने के लिये दीपावली पर काम करते हैं। अब मिट्टी के बर्तनों की बाजार में कोई कीमत नहीं रह गई है। दीपावली पर ही 10 से 15 हजार रुपये तक की आमदनी हो जाती है। इससे पूरे साल का खर्चा चला पाना मुश्किल भरा काम है। बाकी दिनों में मजदूरी से ही परिवार का गुजारा हो रहा है। - रामपाल सिंह।
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