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हिंदी हैं हमः शृंगार, अलंकार से गीतों में अद्भुत प्रभाव पैदा करते थे नीरज

Tue, 10 Aug 2021 02:08 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो अमर उजाला, अलीगढ़।
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शहरयार पार्क में स्थित पद्मभूषण डॉ गोपाल दास नीरज की प्रतिमा । अमर उजाला - फोटो : CITY OFFICE
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दीपक शर्मा
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प्रसिद्ध गीतकार पद्मभूषण गोपालदास नीरज ने अपने गीतों में कविता को जीवित रखा, फिल्मी गीतों में शृंगार, अलंकार और कविता का मिश्रण करके अद्भुत प्रभाव पैदा किया, जिसने हिंदी गीतों को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी स्मृति में प्रदर्शनी मैदान में जिला प्रशासन द्वारा नीरज शहरयार पार्क बनाया गया। यह निश्चित रूप से उनकी यादों को संजोए रखने में सहायक होगा। नीरज के नाम पर राजकीय औद्योगिक एवं कृषि प्रदर्शनी में कविता के क्षेत्र में पुरस्कार भी प्रदान किया जाता है।
पिता गोपालदास को याद करते हुए बेटे मिलन प्रभात गुंजन कहते हैं, पापा का यह सफर 18 वर्ष की आयु से शुरू होकर अनवरत 93 वर्ष की आयु (मृत्यु) तक जारी रहा। यह लंबा सफर ही जनमानस में उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है। नीरज जी ने 5 जनवरी 1925 को जिला इटावा के पुरा वर्ली नाम के गांव में मध्यमवर्गीय कायस्थ परिवार में जन्म लिया था। बचपन बहुत ही विकट परिस्थितियों और संघर्षों के बीच गुजरा। उन्होंने अपने सुमधुर कंठ और अद्भुत काव्य शैली से कविता जगत में जो पहचान बनाई है, वह बेहद मौलिक और आकर्षक है। उनकी कविताएं लोगों के हृदय को अंदर तक उद्वेलित करती हैं। उनके गीतों को, कविताओं को बार बार सुनने के बाद उनके शब्दों में छिपे गूढ़ अर्थ और उसके दर्शन को समझा जा सकता है। नीरज जी ने शृंगार, बिरह, वीर रस, अध्यात्म, हर बिंदु को अपनी कविता में छुआ है। उनके गीतों और कविता में दार्शनिकता भी देखी जा सकती है।
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गुंजन कहते हैं, नीरज जी ने गीतिका, मुक्तक और रुबाई, दोहे और हाइकु जैसी शैलियों में खूब लिखा है। उन्होंने फिल्मों में गीत भी लिखे और अधिकांश गीत बहुत प्रसिद्ध हुए। आज भी उनके गीत उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने चार और पांच दशक पहले थे। हिंदी के कुछ शब्द जैसे मदिर, मधुर, पाती, गीतांजलि आदि शब्दों का पहली बार फिल्मी गीतों में इस्तेमाल किया गया, जो लोगों की जुबान पर चढ़ गए। उनको पद्मश्री और पद्मभूषण के साथ-साथ साहित्य शिरोमणि, यश भारती आदि पुरस्कारों से नवाजा गया। उनके साहित्य पर समय-समय पर शोध भी किए गए, जो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हैं। उनका पुत्र होना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। मैं उनको नमन करता हूं।
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तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिला
गोपालदास नीरज अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिंदी विभाग में प्राध्यापक रहे। अलीगढ़ के जनकपुरी में उन्होंने अपना स्थायी आवास बनाया। इससे पहले उन्होंने मेरठ में भी अध्यापन कार्य किया। 1970 में फिल्म चंदा और बिजली के लिए लिखा गया गीत (काल का पहिया घूमे रे भैया), 1971 में फिल्म पहचान के लिए लिखा गया गीत (बस यही अपराध में हर बार करता हूं) और 1972 में फिल्म मेरा नाम जोकर के लिए लिखा गया गीत (ए भाई जरा देखकर चलो के लिए) उन्हें फिल्म फेयर पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके अलावा, उनके कई कविता संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें कारवां गुजर गया (1964), नीरज की पाती (1958), आसावरी (1963), संघर्ष (1944), अंतरध्वनि (1946), विभावरी (1948), प्राण गीत (1951), दर्द दिया है (1956), बादल बरस गयो (1957), मुक्तकी (1958), दो गीत (1958), गीत भी अगीत भी (1959), नदी किनारे (1963), लहर पुकारे (1963), फिर दीप जलेगा (1970), तुम्हारे लिए (1972), नीरज की गीतिकाएं (1987) आदि शामिल हैं। समाजवादी पार्टी की सरकार में उनको भाषा संस्थान का अध्यक्ष नामित कर कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्रदान किया गया था। साथ ही वह मंगलायतन विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी रहे।
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