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गांधीजी की बातों ने किया असर, अंग्रेजी हुकूमत होने लगी बेअसर

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महात्मा गांधी । - फोटो : CITY OFFICE
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अलीगढ़ की सरजमीं पर महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, शहीदे आजम भगत सिंह, पंडित जवाहरलाल नेहरू, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन सहित कई हस्तियों के कदम पड़े। उन्होंने भाषण से स्थानीय लोगों को आजादी की मुहिम में शामिल करने के लिए जोश भरा । उन दिनों गांधीजी की बातों का इतना असर हुआ कि अंग्रेजी हुकूमत बेअसर लगने लगी थी।
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एएमयू उर्दू अकादमी के पूर्व निदेशक डॉ. राहत अबरार के अनुसार, गांधीजी ने अलीगढ़ से ही राष्ट्रीय आंदोलन को धार दी थी। छात्रसंघ के न्यौते पर वर्ष 1925 में महात्मा गांधी एएमयू आए थे। उस समय उन्हें आजीवन सदस्यता दी गई। उन्होंने जो भाषण दिया था, उसका असर हुआ। उसी दौरान गांधीजी ने कहा था कि ‘एएमयू के छात्र मेरे साथ आ जाएंगे तो आजादी हासिल करना मुश्किल नहीं होगा। इसी के बाद राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय तौर पर शामिल होने वालों की तादाद बढ़ती गई। पंडित जवाहर लाल नेहरू के करीबी अब्दुल मजीद ख्वाजा, मोहनलाल गौतम ने अलीगढ़ में कमान संभाली। उन दिनों दोनो नेता अब्दुल मजीद ख्वाजा के घर पर रुके थे। दोनों नेता एएमयू के एकेडमिक स्टाफ क्लब में तीन बार आए थे।
डीएस कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. राजेश कुमार ने बताया कि पंडित नेहरू 1935 में अलीगढ़ आए थे। शहीद-ए- आजम भगत सिंह काकोरी कांड को अंजाम देने के बाद टप्पल के गांव शादीपुर में ठा. टोडर सिंह के यहां एक शिक्षक रूप में रहे थे। 1937 में हरदुआगंज में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरु, पंडित गोविंद वल्लभ, विश्व विख्यात साम्यवादी एमएन राय आदि शामिल हुए थे। इनके भाषण सुनने के लिए 50 हजार से ज्यादा जनता एकत्रित हुई थी। वर्ष 1940 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस अलीगढ़ आए थे। फारवर्ड ब्लाक की स्थापना के बाद वह पूरे देश का दौरा कर रहे थे। नेताजी को हापुड़ लेने हरपाल सिंह, रामगोपाल आजाद पहुंचे। खैर के बांकेलाल शर्मा पहले ही वहां पहुंच गए थे। नेताजी खैर, लोधा होते अलीगढ़ पहुंचे। उन्होंने मालवीय पुस्तकालय में बड़ी जनसभा की थी। 1941 में राजनैतिक सम्मेलन हुआ, जिसकी अध्यक्षता पहले दिन राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन और दूसरे दिन पंडित नेहरू ने की थी। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अलीगढ़ स्टेशन पर बम कांड हुआ था। गांधीजी के करो या मरो नारा के बाद अलीगढ़ में नेताओं का गोपनीय तरीके से आना शुरू हो गया। क्रांतिकारी अरुणा आसफ अली का आगमन भी हुआ था।
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