मुस्लिम मतों का विभाजन, हिंदू वोटों का एका
प्रशांत सिंघल को कुल 193889 वोट मिले। सपा के जमीरुल्लाह (132987) और बसपा के सलमान (45917) के मतों को जोड़ भी लिया जाए तो भी प्रशांत की बढ़त साफ दिखती है। हालांकि सपा और बसपा ने अपने वोट न बांटे होते और मुकाबला सीधा होता तो नतीजा कुछ और भी हो सकता था। अमर उजाला ने मतदान के दिन ही लिख दिया था कि अलीगढ़ में ध्रुवीकरण साफ दिखा। हिंदू बहुल इलाकों में लोग घरों से निकले और प्रशांत के पक्ष में वोट किया। स्वर्ण जय़ंती नगर, एडीए कॉलोनी, कुलदीप नगर जैसे हिंदू बहुल इलाकों में कड़ी धूप के बावजूद वोटरों की लंबी-लंबी कतारें देखी गईं। व्हाट्स एप और मैसेंजर जैसे सोशल मीडिया पर भी इस तरह के संदेश खूब तैरे कि हिंदुओं वर्ष 2017 की गलती न दोहराओ। उल्लेखनीय है कि साल 2017 में भाजपा अलीगढ़ में मेयर की सीट हार गई थी। इसका ठीकरा हिंदू वोटरों का घरों में कैद रहने को फोड़ा गया था। इस संदेश का भी असर हुआ और हिंदू वोटर घरों से निकले।
मुख्यमंत्री योगी की छवि और आखिरी दिनों में दौरा
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बुलडोजर बाबा की छवि भी इस चुनाव में खूब काम आई। स्वर्णजयंती नगर में एक चाय की दुकान पर बैठे रवि से जब इस संवाददाता ने मतदान के ट्रेंड की बाबत पूछा तो उसका कहना था कि साहब यह सड़क देख रहे हैं। यहां दिन में ही मोबाइल और स्कूटर छिन जाया करते थे। वो बाबा जबसे आए हैं कि रात भर अकेले घूमो कुछ नहीं होता। शोहदे लड़कियां छेड़ते थे, अब घरों में दुबके हैं। योगी आदित्यनाथ ने चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में अपनी जनसभा की। उससे भी प्रशांत को काफी संजीवनी मिली। योगी पहले भी अलीगढ़ खूब आते रहे। संगठन पर उनकी पैनी पकड़ और नजर बनी रही।
आखिरी दौर का कुशल प्रबंधन
योगी के दौरे के पहले तक प्रशांत के संघर्षपूर्ण मुकाबले में फंसे होने की बात कही जा रही थी। पार्टी के कई वरिष्ठ कार्यकर्ता नाराज नजर आ रहे थे। ऐसा भी फीडबैक मिला कि प्रशांत के इर्द-गिर्द कई ऐसे लोगों का घेरा बन गया है जो प्रचार के बजाय उन्हें डुबाने में लगे हैं। आलम यह था कि पर्चियां तक भी नहीं बंट पाई थीं। ऐसे में प्रशांत के कई नजदीकी रिश्तेदारों ने प्रबंधन की कमान संभाली। संसाधन भी झोंके गए। रूठों तक पहुंचकर मनाया गया।