धान की कटाई खेतों में ही पराली जलाने से वायु प्रदूषण और खेत की उपजाऊ क्षमता कमजोर होने के चलते लगी रोक और कार्रवाई का डर असर दिखाने लगा है। जिला प्रशासन किसानों को पराली नहीं जलाने के लिए लगातार जागरूक भी कर रहा है। पराली जलाने के बजाय गोशाला में गोवंश के लिए दान करने की अपील की जा रही है। यही वजह है कि लगातार इन प्रयासों से पिछले तीन साल से जिले में पराली जलाने की घटनाओं में कमी आई है।
जिला कृषि अधिकारी अभिनंदन सिंह ने बताया कि पराली जलाते हुए पाए जाने पर संबंधित किसान पर जुर्माने का नियम है। किसानों को भ्रम है कि पराली जलाने के बाद अवशेष (राख) से खेत को खाद मिलेगी और खेत साफ हो जाएगा, लेकिन यह सोच गलत है। पराली जलाने से भूमि की उपजाऊ क्षमता न केवल कम हो जाती है बल्कि लाभदायक कीट भी खत्म हो जाते हैं। यह वायु प्रदूषण का कारण भी बनती है, जिससे मनुष्य, पशु, पक्षी आदि को विभिन्न प्रकार की बीमारियां होती हैं। इसका उदाहरण दिल्ली, पंजाब, हरियाणा में कुछ वर्षों से देखने को मिल रहा है। इसे देखते हुए किसानों को पराली नहीं जाने की हिदायत दी जा रही है।
उन्होंने बताया कि इसकी मॉनिटरिंग के लिए कृषि विभाग की विशेष टीम बनी हुई है। वर्ष 2019 से पराली को जलाने पर रोक लगी है। पहले साल 75, दूसरे साल 34, तीसरे साल 32 किसानों के खिलाफ पराली जलाने पर जुर्माना आदि की कार्रवाई की गई है। इस साल अब तक तीन मामले टप्पल एवं दो मामले थाना गभाना क्षेत्र में पकड़ में आए हैं। जहां किसानों पर अर्थदंड लगाया गया है।
वायु प्रदूषित होने से बढ़ रहा बीमारियों का खतरा
जिला कृषि अधिकारी अभिनंदन सिंह ने बताया कि एक टन धान की पराली जलाने से हवा में तीन किलो ग्राम कार्बन, 513 किलो ग्राम कार्बन डाई-आक्साईड, 92 किलो ग्राम कार्बन मोनो ऑक्साइड एवं 250 किलो ग्राम राख घुल जाती है। पराली जलाने से वायु प्रदूषित होने पर आंखों में जलन एवं सांस संबंधित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। पराली जलाने से भूमि की उपजाऊ क्षमता लगातार घट रही है, इस कारण भूमि में 80 प्रतिशत तक नाइट्रोजन, सल्फर एवं 20 प्रतिशत अन्य पोषक तत्व की कमी आ गई है। मित्र कीट की मृत्यु होने से फसलों में नई-नई बीमारियां उत्पन्न होती है। एक टन धान पराली जले से 5.5 किलो ग्राम नाइट्रोजन, 2 किलो ग्राम फास्फोरस और 1.2 किलो ग्राम सल्फर जैसे पोषक तत्व नष्ट हो जाते है। पशुओं के लिए वर्ष भर चारा आपूर्ति की समस्या बन जाती है। किसान पराली जलाने की अपेक्षा गोशाला आदि को दान कर सकते हैं।