एडीजीसी जेपी राजपूत बताते हैं कि इस मुकदमे में कुल 17 गवाह पुलिस चार्जशीट के अनुसार थे। जिनमें से 10 जुलाई 1984 को एडीजे प्रथम की अदालत में पहली गवाही रघुनाथ की पत्नी चंद्रमुखी की और चश्मदीद खचेर सिंह की हुई। इसके बाद दो अगस्त 1984 को हाईकोर्ट ने मामले में स्टे लगा दिया। तब से मुकदमा अलग-अलग चार अदालतों में गया। मगर हाईकोर्ट को पत्राचार के बाद भी कोई अग्रिम आदेश न मिलने के कारण कोई कार्यवाही नहीं हुई। 39 साल बाद इसी वर्ष 14 मार्च को खुद बचाव पक्ष की ओर से एडीजे प्रथम की कोर्ट में यह अर्जी दायर की गई कि पहले दो गवाहों से पुन: जिरह कराई जाए। इस पर वादी चंद्रमुखी को न्यायालय ने तलब किया।
इस पर अधिवक्ता की सलाह से चंद्रमुखी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने गवाह को पुन: तलब करने का आदेश निरस्त करते हुए पुरानी गवाही मानने का आदेश देकर दिन प्रतिदिन सुनवाई के आदेश दिए। साथ में छह माह में निस्तारण को कहा। इसके बाद जब प्रथम दो के बाद शेष पंद्रह गवाह तलाशे गए तो कोई नहीं मिला। मगर एक पोस्टमार्टम, सीएमओ दफ्तर के चालक और थाने के सेवानिवृत्त दरोगा को द्वितीय गवाह के रूप में तलाशा जा सका। जिसमें तीनों ने यह स्वीकारा कि उनके सामने गवाह लिखा पढ़ी किए थे और पूरी प्रक्रिया अपने सामने उन्होंने देखी। इस तरह पांच लोगों की गवाही व मुकदमे की डायरी के आधार पर दोषी करार देकर सजा सुनाई गई।
बिक गई जमीन, बुढ़ापे में मिला सुकून
इस फैसले पर चंद्रमुखी बताती है कि जब उसके पति की हत्या हुई तो उसका बड़ा बेटा सुभाष आठ व छोटा जुगेंद्र ढाई वर्ष का था। जैसे तैसे बच्चों को पाला और मुकदमे से लेकर बच्चों के लालन-पालन में जमीन तक बिक गई। तमाम प्रयास दबाव व समझौते के हुए। मगर वह नहीं मानी। अब चालीस वर्ष बाद भी पुन: जिरह के पीछे उनकी मंशा दबाव की थी। मगर हाईकोर्ट ने उसे राहत दी और पति की हत्या में दोषी को सजा से दिल को सुकून मिला है।