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Gopaldas Neeraj: सदियां लगेंगी गोपालदास नीरज को भुलाने में, रूमानी गीतों के थे राजकुमार

Wed, 19 Jul 2023 02:03 AM IST
चमन शर्मा इकराम वारिस, अमर उजाला, अलीगढ़

सार

मायानगरी के लिए गोपालदस नीरज ने कई गीत लिखे। इनमें लिखे जो खत तुझे.. वो तेरी याद में.., बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं..., ये भाई जरा देख के चलो.., खिलते हैं गुल यहां, खिल के बिखरने को, फूलों के रंग से दिल की कलम से.., स्वप्न झरे फूल से मीत चुभे शूल से.., कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे.. बेहद चर्चित हैं। 
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गोपालदास "नीरज": भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना - फोटो : Social Media
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विस्तार
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रूमानी गीतों के राजकुमार कहे जाने वाले गोपालदास नीरज ने लिखा था-इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में, तुमको लग जाएंगी सदियां हमें भुलाने में। लेकिन इस गीतकार को शायद ही कभी भुलाया जा सके।  

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4 जनवरी 1925 को इटावा जिले के गांव पुरावली में जन्मे नीरज जब छह साल के थे, तब उनके सिर से पिता का साया उठ गया था। उन्होंने डीएस कॉलेज के हिंदी विभाग में बतौर शिक्षक अपने दायित्व का निर्वहन किया। मायानगरी के लिए उन्होंने कई गीत लिखे। इनमें लिखे जो खत तुझे.. वो तेरी याद में.., बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं..., ये भाई जरा देख के चलो.., खिलते हैं गुल यहां, खिल के बिखरने को, फूलों के रंग से दिल की कलम से.., स्वप्न झरे फूल से मीत चुभे शूल से.., कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे.. बेहद चर्चित हैं। 

वह कवि सम्मेलन और मुशायरों की शान बनते गए। पद्मश्री और पद्मभूषण से अलंकृत नीरज जी ने शर्मीली, मझली दीदी, कन्यादान, दुनिया, जंगल में मंगल, यार मेरा, मेरा नाम जोकर, प्रेम पुजारी, तेरे मेरे सपने, कल आज और कल, छुपा रुस्तम, गैंबलर, मुनीम जी, रेशम की डोरी, जाना न दिल से दूर आदि फिल्मों में करीब 135 गीत लिखे। राजकपूर, देवानंद, एसडी वर्मन से उनके बेहद करीबी रिश्ते थे। गोपाल दास नीरज 19 जुलाई 2018 को दुनिया को अलविदा कह गए।

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अब वे खामोश भी हैं और आंखें भी नीम खुली हैं, मूंद-सी गई हैं। अचानक से हंसी की एक धीमी-सी आवाज सुनाई दी। होठों की ओर देखा तो उनकी हरकत में एक शरारत-सी झांकती दिखी - 'भूतसिद्धि की बात बताई थी क्या कभी तुम्हें पहले?' मैं चौंका। नीरजजी और भूतसिद्धि? 'नहीं'! - 'नहीं, तो सुनो! क्या-क्या नहीं किया उस दौर में!' अब हंसी ने अपनी आवाज जरा ऊंची कर ली है- 'गर्मियों के दिन थे। तब बिजली- विजली तो थी नहीं। हमारे मोहल्ले में पंडित विश्वनाथ रहते थे। हम उन्हें गुरुजी कहते थे। घर के पीछे एक मठिया थी। वह रात को उसी में सोते थे। पानी छिड़ककर उसे ठंडा कर लिया करते। रात के समय मुहल्ले के लड़के वहां इकट्ठे होते और उनसे 'चंद्रकांता सन्तति' सुनते। आश्चर्यजनक थी उनकी याददाश्त। चार भाग 'चंद्रकांता' के, चौबीस भाग 'चंद्रकांता सन्तति' के, इक्कीस भाग 'भूत नाथ' के, आठ भाग 'रोहिताश्व मठ का पुजारी' के उन्हें कंठस्थ थे।

पता नहीं पढ़कर आते थे या क्या करते थे। लड़के पैर दबाते रहते, वे सुनाए जाते। कोई रबड़ी लेकर आता, कोई और चीज और वह पूरा एक भाग सुनाते रोज-जो आधी रात के बाद खत्म होता। समाप्ति पर आता तो अंत में ऐसा रहस्य कि अगले दिन सुनने को बेचैन रहते, इंतजार रहता। बड़े हंसमुख, बड़े चरित्रवान थे गुरुजी। हमारी मां को मौसी कहते। उम्र में हमसे थोड़े बड़े थे। एक उमाचरण पंडित भी थे। वे बूढ़े थे और हम लोगों के साथ ही वे भी सुना करते। एक दिन क्या हुआ कि वह उठे -अंधेरा था सो मठिया की हौदी में गिर गए। गुरु ने पूछा- क्या हुआ पंडित? उमाचरण चिल्लाए - 'पंडितजी भूतनाथ तिलिस्मी तालाब में कूद पड़ा...' हंसे जा रहे हैं उस दृश्य को याद करके - 'तो ऐसा अजीब असर था हम सब पर उन दिनों भूतनाथ का। 
नीरजजी अपने बारे में अक्सर कहते थे कि मेरी शिक्षा पुरानी परंपरा के अनुसार नहीं हुई और न ही उन पर किसी तरह किसी का असर हुआ है। मेरी साहित्यिक परवरिश घर-बाहर के माहौल और ब्रज व अवधी अखबार से हुई है। इसका असर उनकी कविताओं में है। उनकी कविताओं में नरमी, साफगोई और बेबाकी है। -प्रो. सगीर अफराहीम, पूर्व विभागाध्यक्ष उर्दू विभाग, एएमयू। 
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नीरज जी के सानिध्य में मिला काव्य पाठ का अवसर  

नीरज जी के साथ 2013 में अलीगढ़ नुमाइश में आयोजित दिल्ली दरबार की आखिरी शमा कार्यक्रम में शिरकत करना मैं अपनी विशिष्ट उपलब्धि मानता हूं। प्रथम बार नीरज जी के सानिध्य में काव्य-पाठ का अवसर सन् 1987 में मिला। कासिमपुर पावर हाउस में सन् 1992 में आयोजित कवि सम्मेलन में नीरजजी ने मेरे पहले व्यंग्य काव्य संग्रह भानुमती का पिटारा और इसके बाद कई पुस्तकों का लोकार्पण किया। 2014 में नुमाइश प्रशासन द्वारा प्रदत्त एक लाख एक हजार रुपये का नीरज पुरस्कार उनके ही कर कमलों से मिलना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। -डॉ. अशोक अंजुम, कवि

पद्म भूषण गोपाल दास नीरज गीतों के ऐसे बेताज बादशाह थे कि उनके गीत जनमानस में एक जादू सा जगा देते थे ।हिंदी साहित्य से लेकर फिल्मों तक उन्होंने हिंदी की पताका को पूरी दुनियां में लहराया । वे मुझे अपना सबसे प्रिय शिष्य मानते थे ,वे अपने साथ मुझे देश के अनेक हिस्सों के कवि सम्मेलनों में ले जाते और अच्छे से अच्छा पेमेंट कराते थे । मेरी पहचान अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में उन्हीं की वजह से बनी। उनके बारे में यही कह सकता हूं कि
सारे जगत में गीत की पहचान थे नीरज ।
साहित्यकार के लिए सम्मान थे नीरज ।
कविता हो ,गीत हो ,रूबाई हो या गजल ,
हर इक विधा को ईश्वरी वरदान थे नीरज ।
-ओजस्वी कवि डॉ,हरीश बेताब
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