अपराध होते रहेंगे। अपराध करने के बाद भी अपराधी बच रहे हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि क्राइम सीन मैनेजमेंट में हम पिछड़ रहे हैं। वारदात के बाद हम गवाह और अंदाज पर जांच की दिशा तय कर रहे हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि घटना स्थल पर जांच टीम के पैरों तले साक्ष्य रौंदे जा रहे हैं।
अपराधी को इसका लाभ मिल रहा है। विधि विज्ञान प्रयोगशाला लखनऊ के निदेशक डॉ. एसबी उपाध्याय ने क्राइम कंट्रोल के लिए फोरेंसिक यूनिवर्सिटी की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि जब तक जांच फोरेंसिक एक्सपर्ट नहीं करेंगे सबूतों के अभाव में अपराधी सजा से बचते रहेंगे।
अलीगढ़ कमिश्नरी सभागार में मेडिकोलीगल को लेकर हुई कार्यशाला में अमर उजाला से विशेष बातचीत में डॉ. एसबी उपाध्याय ने बताया कि अभी जांच एजेंसियां क्राइम के तरीके और क्रिमनल की पहचान में 100 फीसदी प्योर रिजल्ट नहीं दे पा रही हैं।
मैकेनिज्म ऑफ इन्फोरमेशन, रिएक्शन टाइम, टीम का गठन क्राइम सीन मैनेजमेंट का हिस्सा है। वारदात के बाद हमको कहीं सूचना समय पर नहीं मिल रही। सूचना मिलती है तो 20 मिनट की जगह घंटों लग जाते हैं एक्शन टाइम में। केस के चरित्र के हिसाब से जांच टीमों का गठन नहीं हो रहा।
ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हमारे पास फोरेंसिक एक्सपर्ट नहीं हैं। केस में भिन्न-भिन्न एजेंसियों के इनपुट और आउटपुट का विश्लेषण वैज्ञानिक विधि से नहीं हो पा रहा है। रिएक्शन और लीगल एक्शन दोनों प्रभावित हो रहे हैं। आरुषि हत्याकांड ताजा उदाहरण है। डॉ. एसबी पाठक कहते हैं कि मेडिकोलीगल में फोरेंसिक एक्सपर्ट की कमी के दुष्परिणाम यह होता है कि मोर्चरी की टेबिल तक साफ नहीं होती इससे हमारे पास सैंपल एक व्यक्ति का भेजा जाता है, लेकिन उसमें प्रोफाइल कई लोगों के जनरेट होते हैं।
ऐसे में उस प्रोफाइल की पहचान चुनौती हो जाती जो अपराधी का है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि जहां मेडिकोलीगल होता है वहां पूर्व के मेडिकोलीगल के प्रोफाइल मिट जाएं यह कोई नहीं सोचता। सिस्टम ऐसा हो गया है कि जिसका जो रोल है वह नहीं कर पा रहा है। मेडिकोलीगल करने वाला फोरेंसिक एक्सपर्ट होगा तो वह यह भी बता सकेगा चोट धक्का देकर गिरने से हुई है या फिसलकर गिरने से चोट लगी है। इससे कई बेगुनाह जेल जाने से बच जाएंगे।