दिन में कहीं और रात में अपने ही घर की चौकीदारी बुजुर्ग कर रहे हैं, यह दुर्योग नहीं तो और क्या है। कभी सपनों ने भी नहीं सोचा नहीं होगा कि मासूम की निर्मम हत्या का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा। देश भर की संवेदनाएं और आक्रोश के ज्वार से दूसरे समुदाय के लोगों में दहशत घर कर गई। बच्चे व महिलाएं घर से अन्यत्र चली गईं। घर पर सिर्फ कुछ बुजुर्ग रह गए हैं।
बच्ची की हत्या के बाद इलाके में नफरत की दीवारें खड़ी करने की कोशिश की जाने लगी। इससे इलाके में दहशत का माहौल बनता गया। दूसरे समुदाय के लोगों ने अपने बच्चों व महिलाओं को बाहर भेज दिया, ताकि उन्हें कोई नुकसान न हो।
घर पर बचे बुजुर्ग दिन में इधर-उधर रहते हैं, जबकि रात को अपने घर पर आकर सो जाते हैं। दिन-रात दहशत में कट रही है। हालांकि, पुलिस फोर्स की आमद से उन्हें हिम्मत मिली है। इस समाज के लोगों का कहना है कि दोषी को जरूर सजा मिले, लेकिन सुबूत के साथ।
बिफरीं अनुसूचित जाति की महिलाएं
इलाके में अनुसूचित जाति की महिलाएं दूसरे समुदाय पर नाराज हैं और हंगामा भी किया। दरअसल, दूसरा समुदाय उन्हें इस विवाद की वजह मान रहा है। 2 जून की सुबह कूड़े के पास बच्ची के शव को कुत्ते नोच रहे थे, तभी इस दिल दहलाने वाले मंजर को अनुसूचित जाति की महिला ने देखा था। फौरन उसने इसकी सूचना आसपास लोगों के साथ पुलिस को भी दे दी। मामले ने तूल पकड़ लिया। इस समाज के लोगों का कहना है कि दूसरे समुदाय के लोग इस प्रकरण का उन्हें दोषी मान रहे हैं।
काम पर आने में कर रहे आनाकानी ः बच्ची की हत्या के बाद उपजे तनाव के चलते इलाके में रोजी-रोजगार करने दूसरे समुदाय के लोग भी नहीं आ रहे। मजदूरी के लिए भी आने में आनाकानी कर रहे हैं।
जो जैसा करेगा, वैसा ही भरेगा। पुलिस की आमद से अब दहशत की कोई बात नहीं रह गई है।
-जलील खां, रिक्शा चालक
पुलिस अगर सक्रियता दिखाई होती तो आज बच्ची होती। मकानों की तलाशी उसी समय होनी चाहिए थी।
-डॉ. विजय कुमार तायल
प्रदर्शन की बात पर दहशत थी, इसलिए बच्चों को बाहर भेज दिया। पुलिस फोर्स देखकर सुकून मिला।
-यूनुस खान
दोषियों को सजा मिलनी चाहिए। लोगों के आने से डर लगने लगा था। यह डर पुलिस ने निकाल दिया है।
-शहनाज