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अफसरों-सफेदपोशों व गुंडों की बदौलत रोडवेज से कमाई जा रही दौलत

Wed, 22 Aug 2018 02:02 AM IST
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
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अफसरों-सफेदपोशों व गुंडों की बदौलत रोडवेज से कमाई जा रही दौलत - फोटो : Rupesh
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यूपी रोडवेज प्रबंधन और कानून को धता बताकर प्राइवेट यूनियन की तर्ज पर रोडवेज बसों में फर्जी टिकट माफिया यूं ही एक दशक से अधिक समय से गोरखधंधा नहीं कर रहे। यह सब रोडवेज अफसरों और सफेदपोशों की सरपरस्ती और खुद की गुंडई के दम पर चल रहा है। कमाई से हिस्सा, सत्ताधारी दलों में राजनीतिक पहुंच और बाउंसरों की दहशत के दम पर चलने वाले इस धंधे से सालाना रोडवेज को करोड़ों का चूना लगाया जा रहा है। सब कुछ इस कदर संचालित हो रहा था कि किसी के कानों पर एक दशक से जूं तक नहीं रेंगी। वह तो अब रोडवेज के परिचालक से माफिया बने गोरखधंधे के सरगना की शिकायत जब सीएम योगी आदित्यनाथ के कानों तक पहुंची तो उन्होंने सिस्टम को सक्रिय कर एसटीएफ को लगाया। तब जाकर मंगलवार को यह कार्रवाई हुई। जब कार्रवाई की भनक अलीगढ़ व आगरा रीजन के रोडवेज अफसरों को हुई तो सभी अपनी गर्दन बचाने में लग गए और चुप्पी साध ली।
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ऐसे चलता था यह गोरखधंधा
अलीगढ़ और मथुरा के मध्य शुरू हुआ यह गोरखधंधा अलीगढ़ से मथुरा के अलावा अलीगढ़ से हाथरस, अलीगढ़ सादाबाद, मथुरा, अलीगढ़ आगरा, अलीगढ़ कासगंज, अलीगढ़ एटा, अलीगढ़ मुरादाबाद रूटों पर सर्वाधिक है। जहां सवारियों का लोड अधिक है। बाकायदा इसके लिए प्रशिक्षित स्टाफ माफिया द्वारा रखा जाता है। उदाहरण के तौर पर माफिया से जुड़ी एक बस सुबह बस स्टैंड से निकलती है तो उस पर बाकायदा माफिया का चिह्नित स्टाफ ही तैनात रहता है। इस बस की एक चक्कर की औसत आय 5 हजार है तो एक चक्कर एक नंबर में यानी असली टिकट पर जाएगा। इसके बाद शाम 3 से 4 बजे तक जितने भी चक्कर लगेंगे, उसमें माफिया का स्टाफ फर्जी टिकट ही यात्रियों को जारी करेगा। यात्री के उतरते समय किसी न किसी बहाने टिकट को कंडेंक्टर वापस ले लेगा। प्रत्येक रूट पर हर 10 से 15 किमी पर बाउंसरों की चेक पोस्ट तैनात रहती है। कोई झगड़ा झंझट यात्री करे या रोडवेज की चेकिंग आए तो यह बाउंसर तत्काल कवर देने पहुंच जाते हैं। मारपीट कर यात्री को या चेकिंग करने वाले को भगा देते हैं। अलीगढ़ मथुरा के मध्य 4 चेक पोस्ट हैं। इगलास में गोंडा अड्डे  पर बाउंसरों की चेक पोस्ट है। वैसे यह बाउंसर चेक पोस्टों पर फाइनेंस कंपनियों के लिए वाहनों से रिकवरी के नाम पर बैठे रहते हैं।

पहले शिकायत पर दी गई गोरखधंधे को क्लीनचिट
मंगलवार को एसटीएफ, परिवहन निगम की टीम ने विभागीय डग्गेमारी पर जब कार्रवाई शुरू की तो अफसरों में अफरा-तफरी मच गई। ऐसा नहीं था कि निगम अधिकारियों को इस विषय में जानकारी न थी, सब कुछ जानकर भी अनजान बनकर निगम को प्रतिमाह करोड़ों रुपये का चूना लगाया जा रहा था। विभागीय डग्गेमारी में मथुरा के अलावा बुद्ध विहार व हाथरस डिपो की बसें भी संचालित हो रही थी। सभी बसें गांधी पार्क बस अड्डे से सवारी लेकर खुलेआम जाती थी, लेकिन रैकेट का इस कदर रसूख था कि बस स्टैंड पर मौजूद कर्मचारी इसका विरोध नहीं कर पाते थे। कई बार रोडवेज कर्मचारी नेताओं ने आरएम से इस संबंध में शिकायत भी की, लेकिन वे चुप्पी साधे रहे। यहां तक कि मुख्यालय में इसकी शिकायत हुई तो क्षेत्रीय प्रबंधक अतुल त्रिपाठी ने मथुरा-अलीगढ़, हाथरस-अलीगढ़ मार्ग पर स्पेशल चेकिंग के निर्देश भी दिए। क्षेत्रीय प्रबंधक के निर्देश पर इन मार्गो पर मार्च व अप्रैल माह में चेकिंग भी र्हुई, लेकिन चेकिंग में शामिल अधिकारियों ने इन बसों को क्लीन चिट दे दी। इस कार्रवाई होने के बाद देर रात तक ग्रुप में संचालित गाड़ियों की सूची बनाकर उनकी चक्रवार आय का लेखा-जोखा तैयार किया जा रहा था।
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ड्यूटी स्लिप को भी ले गए डग्गेमार
इगलास में एसटीएफ द्वारा की गई कार्यवाही के बाद बुद्ध विहार डिपो की पांचों गाड़ियों को तत्काल डिपो में खड़ा करा दिया। बताया जाता है कि इन बसों की ड्यूटी स्लिप को भी विभागीय डग्गेमारी करने वाले शातिर अपने साथ ले गए।


डग्गेमारी में चल रही बस दे रही थी कम एवरेज
डग्गेमारी में चलने वाली बसों का एवरेज भी कम आता था, लेकिन निगम के अधिकारी अपनी जेब गर्म होने के चलते सब कुछ जानकर भी आंख मूंदकर बैठे रहे। यदि इसकी गहनता से जांच की जाए तो पता चल जाएगा कि डग्गेमारी में चलने वाली बस एक लीटर से चार किलोमीटर तथा अन्य बस एक लीटर में साढ़े पांच किलोमीटर का एवरेज निकाल कर देती है। सूत्रों का कहना है कि एवरेज कम निकलने पर निगम के चालक की तनख्वाह से रिकवरी होती है, लेकिन डग्गेमारी वालों से वसूली का कोई प्रावधान नहीं है।

2006 से संचालित है विभागीय डग्गेमारी
 विभागीय डग्गेमारी आज से नहीं बल्कि 2006 से लगातार संचालित हो रही है। हालांकि बीच में कभी कभार एक दो दिन से लिए इन बसों को रोक दिया जाता है, लेकिन इतने सालों से लगातार डग्गेमारी होना और कार्यवाही न होना अपने आप में बड़ा सवाल खड़ा करता है।

मास्टर माइंड देवेंद्र पहलान है रोडवेज में परिचालक
विभागीय डग्गेमारी करने वाला मास्टर माइंड मथुरा निवासी देवेंद्र पहलवान रोडवेज में परिचालक के पद पर तैनात है। यहीं से उसने अधिकारियों को अपने प्रभाव में लेकर विभागीय डग्गेमारी का रैकेट शुरू किया। बताया जाता है मास्टर माइंड प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार होती है उसके किसी न किसी मंत्री का चहेता बनकर खुलेआम अधिकारियों पर अपना प्रभाव डालता है। इसके अलावा मेघ सिंह व ज्ञानेंद्र भी रोडवेज में कर्मचारी हैं। बाकी पकड़े गए बाउंसर और बतौर कंडेक्टर कार्यरत स्टाफ के सदस्य हैं।

परिचालक टिकट बनाते समय खींच देते थे कागज
डग्गेमारी करने वाले इतने शातिर थे कि वह पढ़े लिखे यात्री को भी चूना लगा देते। बस में सवार यात्री को ऐसी टिकट दी जाती थी कि जिस पर छोटे और धुंधले अक्षर आते हैं। टिकट में न तो बस का नंबर होता था और न ही डिपो का नाम। बताया जाता है कि परिचालक जब टिकट बनाता तो मशीन में निकलने वाले कागज को खींच देता। इससे उसके ऊपर ठीक तरह से प्रिंट नहीं होता। यदि कोई यात्री इसका विरोध करता तो मशीन को खराब बताकर उसे चुप करा दिया जाता था।

रोजाना हजारों जान के साथ खेलते थे शातिर
रोडवेज बसों की डग्गेमारी करने वाला रोजाना हजारों लोगों की जान के साथ खेलते थे। इन बसों में सवार यात्रियों के पास टिकट होने के बाद भी वह बे टिकट यात्रा करते थे। यदि ऐसे में कोई बस दुर्घटनाग्रस्त हो जाती तो किसी भी यात्री को रोडवेज की ओर से मिलने वाली मुआवजा राशि नहीं मिलती। चूंकि बस में यात्रा करने वाले के पास टिकट फर्जी होती थी तो इसे निगम कभी स्वीकार नहीं करता।
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