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रोहिंग्या फिर पुलिस निगरानी से गुजरेंगे

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क्राइम डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
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अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार संस्था की रोहिंग्या मुसलमानों के विषय में जारी ताजा रिपोर्ट (जिसमें कहा है कि म्यामांर में 100 गैर मुसलमानों की हत्या इन्होंने की थी) के बाद अलीगढ़ की मीट फैक्ट्रियों में काम करने वाले बड़ी संख्या में रोहिंग्या जिला प्रशासन और पुलिस के रडार पर आ गए हैं। इनके वैध दस्तावेज और अन्य औपचारिकताओं की जांच करने की तैयारी की जा रही है।

अलीगढ़ की मीट फैक्ट्रियों में एक अनुमान के मुताबिक 90 से अधिक परिवारों के 450 से 500 रोहिंग्या मुसलमान काम कर रहे हैं। इनका रहन सहन इलाके विशेष में है।
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फैक्ट्रियों के सिवाय इनकी गतिविधियां अन्य कहीं नहीं पाई जातीं, लेकिन सुरक्षा कारणों पर गौर करें तो इनकी आड़ में देश विरोधी ताकतों के आकर छिपने और इनके द्वारा किसी भी समय वोटर कार्ड से लेकर भारतीय नागरिकता संबंधी अन्य दस्तावेज बनवाए जाने का अंदेशा बना रहता है। इसे लेकर खुफिया तंत्र सक्रिय रहता है और समय-समय पर निगरानी भी रहती है।

पांच साल से लगातार बढ़ रही इनकी संख्या
अलीगढ़ में 2012 के आसपास रोहिंग्या परिवारों का आना उस समय शुरू हुआ, जब यहां मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की जड़ जमना शुरू हुई। उस समय यह चंद परिवार गोंडा रोड के कमेला व गोंडा रोड के बाईपास की मीट फैक्ट्रियों में ही रहा करते थे। धीरे-धीरे मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री के हब कहे जाने वाले मकदूम नगर में इन्हें ठिकाना मिलने लगा और यहां मीट कारोबार से जुड़े स्थानीय लोगों ने इन्हें अपने घरों में किराये पर रखवाना शुरू कर लिया। इस तरह अब तक मकदूम नगर में तकरीबन 300 से 400 लोग आकर बस गए। इसके अलावा करीब एक-एक दर्जन परिवार भुजपुरा व शाहजमाल में भी रह रहे हैं। इस तरह इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। एक एनजीओ के सर्वे के अनुसार यहां 1 हजार के करीब रोहिंग्या शहर की इन बस्तियों में रह रहे हैं।

मीट इंडस्ट्री रोजगार का मुख्य साधन
मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की मजबूरी यह है कि पश्चिमी देशों में रोहिंग्या कटिंग मीट की डिमांड सबसे अधिक रहती है। यह मीट कटिंग में एक्सपर्ट होते हैं। इनके हाथ से कटे हुए मीट की विदेशी बाजार में बेहद मांग रहती है। इसलिए मीट इंडस्ट्री में इन कर्मचारियों की मांग भी अधिक रहती है। यही वजह है कि इन्हें आसानी से यहां की फैक्ट्रियों में रोजगार मिल जाता है। इसके अलावा जो लोग कटिंग के पेशे से अलग हैं, उन्हें मजदूरी में लगाया जाता है। मकदूम नगर में रह रहे कुछ लोगों ने टिर्री और जुगाड़ वाहन भी बना रखे हैं। उनमें मजदूरी पर माल ढुलाई का काम करते हैं।

मकदूम नगर में मदरसा भी चला रहे रोहिंग्या
बेशक कई साल से रोहिंग्या इन मीट फैक्ट्रियों में काम कर रहे हैं। मगर इनका शहर के अन्य हिस्से से कोई नाता नहीं रहता। जो लोग मीट फैक्ट्रियों के अंदर या आसपास रहते हैं। उनके हर इंतजाम की जिम्मेदारी फैक्ट्री मालिकान व प्रबंधक की रहती है, जो उनसे अलग बस्तियों में रह रहे हैं। वह समाज में घुल मिलकर रह रहे हैं। यहां मकदूम नगर में रहने वाले 30 वर्षीय रोहिंग्या मो. बिलाल (आलिम-मदरसे में पढ़ाने वाले) मदरसा चलाते हैं और इनके मदरसे में 30 के करीब रोहिंग्या बच्चे पढ़ते हैं।
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देहली गेट इलाके में जो भी रोहिंग्या रह रहे हैं वह वर्क परमिट के आधार पर रह रहे हैं। समय-समय पर इनकी निगरानी होती रहती है। अब एक बार फिर से इनकी वेरिफिकेशन कराई जा रही है।
-सुनील कुमार सिंह, थाना प्रभारी देहली गेट
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