जिला मुख्यालय से करीब 24 किलोमीटर दूर कस्बा खैर में रामलीला मंचन का इतिहास करीब 172 साल पुराना है। यहां की रामलीला की खास बात यह है कि ब्राह्मण कुल में जन्मे बाल कलाकारों को ही राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न एवं सीता का किरदार निभाने का अवसर मिलता है। मंचन से पहले उनका यज्ञोपवीत संस्कार कराया जाता है। इसके बाद इन स्वरूपों की आरती उतारकर लोग उनका आशीर्वाद ग्रहण करते हैं। समापन पर हवन यज्ञ एवं ब्रह्म भोज होता है। इसमें स्वरूपों की जूठन खाने के लिए लोगों में होड़ रहती है। फिर इन बाल स्वरूपों को हरिद्वार ले जाकर गंगा स्नान कराया जाता है।
नई पीढ़ी निभा रही पुरखों की परंपरा
रामलीला मैदान में 18 सितंबर से छह अक्तूबर तक रामलीला का मंचन होगा। मंचन के लिए बाल कलाकारों का चयन कर उन्हें प्रशिक्षित किया जा रहा है। रामलीला की जो शुरुआत पुरखों ने की थी, नई पीढ़ी उसी परंपरा को आगे बढ़ा रही है। आचार्य वैदेही शरण बल्लभ के निर्देशन में वर्षों से रामलीला मंचन हो रहा था। अब इस परंपरा को आचार्य वेद प्रकाश शर्मा निभा रहे हैं। पहले रामलीला पुरानी तहसील, पैंठ मैदान, पड़ाव मैदान में होती थी। अब दान में मिली जमीन पर इसका मंचन हो रहा है। सरयू पार की लीला देव मंदिर के पास तालाब में होती है। इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचते हैं।
रामपुर के बाद खैर में होती है ऐसी लीला
आचार्य वेदप्रकाश शर्मा कहते हैं कि कस्बा खैर में कोई मंडली रामलीला करने नहीं आती है। स्थानीय बाल कलाकार ही सभी किरदार निभाते हैं। केवल व्यास पीठ से सुनाई जाने वाली चौपाइयों के बाद ही कलाकार अपने किरदार का मंचन करते हैं। ऐसी रामलीला पूरे प्रदेश में केवल जनपद रामपुर में ही होती है।
वर्षों से निभा रहे किरदार
पूर्व चेयरमैन कालीचरन विकल करीब 48 साल से रामलीला आयोजन से जुड़े हैं। 1974 में जानकी के किरदार से अभिनय शुरू किया था। तब से वह गुरु विश्वामित्र, केवट, सबरी, सुमंत, नारद आदि किरदारों का अभिनय कर चुके हैं। इस बार की रामलीला में भी कई किरदार निभाने की तैयारी कर रहे हैं।
युवाओं के कंधों पर परंपरा का भार
रामलीला आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नगर पालिका के बाबू सिया शरण गौतम कहते हैं कि रामलीला के मंचन को अब युवाओं द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसे जनता का सहयोग मिल रहा है। आजकल के टीवी और मोबाइल के जमाने में जिस तरह से लोगों का प्यार मिल रहा है, यह हर्ष की बात है।
एक महीने चलती थी रामलीला
कस्बा निवासी चंद्र शेखर तोमर के अनुसार पहले रामलीला एक महीने तक चलती थी। आज लोगों के पास समय का अभाव है। जिसके चलते अब 10-12 दिनों तक ही मंचन होता है। चंदा कर रामलीला के माध्यम से भगवान राम के आदर्शों को आमजन तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। इससे सद्भाव बना रहता है।