राज्य सरकार ने एक शासनादेश के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के लिए नया जिला गजेटियर तैयार करने का आदेश दिया है। उसके लिए कमेटियों का गठन किया जा रहा है। अलीगढ़ का अंतिम गजेटियर 1909 में तैयार किया गया था। लगभग 400 पेजों की इस पुस्तक में लगभग 114 साल पुराने अलीगढ़ के भूगोल, नदियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सिंचाई व ड्रेनेज सिस्टम, पुलिस व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस संबंध में अतीत का अलीगढ़ नाम से एक समाचार श्रृंखला शुरू की जा रही है। उम्मीद है कि पुराने अलीगढ़ के बारे में जानकारी पाठकों को रुचिकर लगेगी। कृपया अपनी राय से हमें अवगत कराएं।
अंग्रेज भारत की आजादी से 75 साल पहले ही फूट डालो राज करो की नीति पर अमल करते थे। मुसलमानों के बारे में उनकी सोच बेहद खराब थी। इसका सरकारी दस्तावेज खुलासा करते हैं। 1870 ईस्वी के आसपास दिल्ली से एटकिंसन नाम के अंग्रेज को अलीगढ़ का ब्योरा तैयार करने के लिए भेजा गया था। एटकिंसन अतरौली का ब्योरा देते हुए लिखता है कि स्थानीय मुस्लिम बाशिंदे हमेशा बदनाम रहे हैं। उसकी मंशा मुस्लिमों के हिंसा में लिप्त रहने को लेकर थी। क्योंकि बाद में उसने कुछ घटनाओं का जिक्र भी किया है। लेकिन इक्की-दुक्की घटनाओं को लेकर पूरे मुस्लिम समाज के बारे में सामान्य राय कायम करना उनकी कुटिल नीति का हिस्सा रही है।
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एटकिंसन की ओर से अलीगढ़ के बारे में तैयार विस्तृत ब्योरा 1878 में अलीगढ़ गजेटियर के रूप में सामने आया था। वह लिखता है कि ये लोग (मुसलमान) हिंदुओं से धर्मांतरित थे। मुस्लिम अंग्रेजों से नफरत करते थे। उनमें अंग्रेजी शासन के प्रति रोष का भाव था। सितंबर 1857 से पूर्व अलीगढ़ की तहसील अतरौली का निजाम एक तरह से मुसलमानों के हाथ में था। सितंबर 1857 में अलीगढ़ में अंग्रेज कमिश्नर मिस्टर कॉक ने अंग्रेजी शासन के एक विश्वासपात्र अफसर मुहम्मद अली को अतरौली में ज्वाइंट मजिस्ट्रेट और दाऊद खान को उसके सहयोगी के तौर पर भेजा था।
लेकिन मुसलमानों ने उनके प्रशासन से बगावत कर दी। 25 सितंबर को उन्होंने मोहम्मद अली की हत्या कर दी। इस हत्या से भड़के अंग्रेजों ने चुन-चुन कर बागी लोगों को सजा दी थी। बागियों को सजा देने का तो जिक्र अंग्रेजी शासनकाल के दस्तावेज में है लेकिन कितने लोगों को किस जुर्म में क्या सजा दी गई, इसका उल्लेख नहीं है। समझा जाता है कि बगावत को दबाने के लिए अंग्रेजों ने बहुत से निर्दोष लोगों पर कहर ढाया था।
एटकिंसन लिखता है कि स्थानीय इतिहास को खंगालने के बाद पता लगता है कि अतरौली को 12वीं शताब्दी में उत्तर कुमार नाम के एक राजा ने बसाया था। हालांकि इसके बारे में ज्यादा ब्योरा उपलब्ध नहीं है। अतरौली में 1426 में मुबारक शाह की फौजों ने तब डेरा डाला था जब वे जौनपुर सुल्तान के साथ युद्ध करने के लिए जा रही थीं।
कोल अंग्रेजों नजर में खूबसूरत इलाका था
कोल या अलीगढ़ सदर का इलाका अंग्रेजों की नजर में खूबसूरत इलाका था। अंग्रेजों ने इसे -हैंडसम टाऊन - लिखा है। 1878 के आसपास कोल में 101 मोहल्ले थे। ज्यादातर मोहल्ले किसी शख्सियत की सराय के नाम से जाने जाते थे। मसलन-हाकिम की सराय, बाकू की सराय आदि। दरअसल, अलीगढ़ सरायों की शहर इस लिए भी था कि दिल्ली से आगरा, मथुरा, रुहेलखंड जाने वाले यात्री यहां ठहरा करते थे। अलीगढ़ के रसलगंज मोहल्ले की स्थापना क्लाउड रसेल ने 1805 में की थी जो अलीगढ़ के पहले कलक्टर थे। उनकी देखादेखी हाकिम असद अली ने हाकिम का सराय मोहल्ला बसाया था। लेकिन खुद अंग्रेज स्वीकार करते हैं कि हाकिम सराय मोहल्ले के लोग बेहद खराब परिस्थितियों में रहते थे। जारी...
स्रोत- एटकिंसन द्वारा तैयार अलीगढ़ का गजट 1878