दीपक शर्मा
अलीगढ़। मुगल काल में रक्षाबंधन त्योहार के विषय में प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब कहते हैं कि अकबर और जहांगीर दोनों ही इस त्योहार को बेहद धूमधाम से मनाया करते थे।
विवरण मिलता है कि बहुत धूम इस त्योहार की रहती थी। जहांगीर तो आम जनता में शामिल लोगों से भी राखियां बंधवाते थे। जिक्र मिलता है कि कलाई के साथ ही उनका पूरा हाथ राखी के धागों से भर जाया करता था।
प्रोफेसर इरफान हबीब कहते हैं कि अकबर के राजपूत राजाओं के साथ वैवाहिक और पारिवारिक संबंध थे। राजपूत अकबर के दरबार में महत्वपूर्ण पदों पर थे। इसलिए अकबर ने रक्षाबंधन के दिन खास तौर से दरबार में राखी बंधवाने की परंपरा की शुरुआत की।
लेकिन देखा यह गया कि इतने लोग बादशाह को राखी बांधने आने लगे कि पूरा पूरा दिन ही निकल जाया करता था। इसके बाद अकबर ने इस प्रथा को बंद कर दिया। इसका कारण यही था कि दरबार का पूरा समय बिना किसी अन्य कामकाज के समाप्त हो जाया करता था।
बाद में जहांगीर ने लिखा है कि वह अपने पिता की तरह रक्षाबंधन पर राखी बंधवाने की परंपरा की शुरुआत करना चाहते हैं।
प्रोफेसर इरफान हबीब कहते हैं कि संभवत जहांगीर को यह लगता था कि उससे बहुत सारे लोग मिलने नहीं आएंगे। इस तरह राखी और रक्षाबंधन मुगल दरबार में लंबे समय तक एक शानदार परंपरा के रूप में बना रहा।
बाद के मुगल शासकों की अगर बात की जाए तो मोहम्मद शाह के होली खेलने का जिक्र मिलता है। इसके साथ ही यह माना जाता है कि वह रक्षाबंधन का त्योहार भी दरबार के स्तर पर मनाते होंगे, क्योंकि वह काफी हद तक अपने आप को अकबर और जहांगीर की तरह प्रदर्शित करना चाहते थे।