अलीगढ़। अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा होने पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब कहते हैं कि तालिबान का रवैया और लहजा अब बदला हुआ है।
यह वह तालिबान नहीं है जो 20 साल पहले हुआ करता था। अब इन्होंने महिलाओं के अधिकारों, उनकी शिक्षा और समाज निर्माण में उनकी बराबर की भूमिका की बात कही है।
प्रोफेसर इरफान हबीब कहते हैं कि अभी यह सब बातें तालिबान के प्रवक्ता कह रहे हैं। लेकिन भविष्य में क्या हालात होंगे इसको लेकर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।
वह कहते हैं कि 1931 में जब उनके पिता प्रोफेसर हबीब अफगानिस्तान गए थे, तब उन्हें यह देखकर बहुत हैरानी हुई कि वहां पर महिलाएं खेत में हल चला रही थी और महिलाओं के कंधे पर एक हथियार भी साथ में था। उस समय अफगानी समाज में महिलाओं की स्थिति और उनका हक पुरुषों से भी ज्यादा था।
70 के दशक तक वहां पर हालात ठीक ठाक थे। लेकिन उसके बाद महा शक्तियों के हस्तक्षेप के चलते स्थिति खराब होती गई।
प्रोफेसर इरफान हबीब ने कहा कि तालिबान लड़ाके कत्ल तो करते हैं लेकिन लूटमार नहीं करते। वह पठान हैं। अब अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद इनका लहजा बदला हुआ नजर आ रहा है यह लोग टेलीविजन पर इंटरव्यू भी दे रहे हैं और इनका इंटरव्यू लेने वाली एक महिला है इसके अलावा अन्य माध्यम से भी यह विश्व समुदाय को आश्वस्त करना चाहते हैं कि वह सभी को साथ लेकर हुकूमत करना चाहते हैं।
अफगानिस्तान में पर्दा प्रथा नहीं थी, महिलाएं मर्जी से शादी करती थीं
अलीगढ़। प्रोफेसर इरफान हबीब कहते हैं कि एक वक्त था जब अफगान जमीन पर कबीलाई संस्कृति थी। वहां पर महिलाएं अपनी मर्जी से फैसला लेने के लिए स्वतंत्र थीं।
मुगल काल में भी यही स्थिति थी। एक कबीले से दूसरे कबीले में शादी करने के लिए महिलाएं अपनी मर्जी की मालिक थीं। पर्दा प्रथा का दूर-दूर तक कोई चलन नहीं था। बादशाह अहमद शाह के समय मुगल साम्राज्य जब कमजोर पड़ने लगा तब ईरान के शाह नादिरशाह ने काबुल को अपने साम्राज्य में मिला लिया था। नादिर शाह के विश्वासपात्र सेनापति अहमद शाह अब्दाली ने बाद में अलग से दुर्रानी साम्राज्य की स्थापना करी, जिसे आज का अफगानिस्तान कहा जाता है।