इकराम वारिस, अलीगढ़।
भारत-पाकिस्तान के विभाजन का दर्दनाक मंजर आज भी जेहन में घूमता है। हंसता-खेलता बचपन उदासी और अपनों के खोने के गम में बीतता गया। बहुत ही तकलीफ मंजर था। आज भी किसी के मुंह से रावलपिंडी (पाकिस्तान) का नाम सुनती हूं तो दिल में एक हूक सी उठती है।
आज भी उन्हें उनका घर याद आता है। अपनी उस जन्मभूमि को देखनी की तमन्ना है, जहां बचपन के दिन बिताए थे। यह कहना है कि भारत-पाकिस्तान के विभाजन का दर्द झेलने वालीं तृप्ता सहगल (82) का, जब वह रावलपिंडी से दिल्ली आई थीं, तब उनकी उम्र पांच साल की थीं।
भारत-पाकिस्तान के विभाजन का जिक्र जब भी होता है, तो तृप्ता मैंगी (विवाह के बाद) परेशान सी हो जाती हैं। यह दर्द तब और बढ़ जाता है, जब रावलपिंडी का नाम सुनती हैं। वह कहती हैं कि रावलपिंडी का नाम सुनने पर एक दिल में हूक सी उठती है, क्योंकि वह उनकी जिंदगी का एक अहम अध्याय है।
उन्होंने कहा कि उनका परिवार रावलपिंडी सदर में एक बहुत बड़े से मकान में हंसी - खुशी रह रहा था, जिसमें पिताजी अमर सिंह, मां सोमावती, बड़े तीन बहन-भाई थे। घर में ताया के चार बेटे और दो बेटियां भी रहती थीं। पिताजी की रावलपिंडी में बड़ी साख थी।
पिताजी का एक बर्फ खाना, दो राशन डिपो और अंग्रेजों की पलटन को हंडो और स्टोव की सप्लाई की ठेकेदारी थी। रावलपिंडी के भी हालात उस वक्त ठीक नहीं थे। रोज ही दंगों की खबरें आती हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे को लेकर अखबार, रेडियो पर कई तरह की खबरें आती रहतीं।
अफवाहों से शहर के खुशनुमा माहौल में जहरीली नफरत की हवा फिजा में बहने लगी। हालात खराब होने पर रावलपिंडी से निकलना बेहतर समझा गया। रास्ते भर जगह-जगह जली हुई दुकानें और घर, अल्लाह ओ अकबर के नारे लगाते हुए लोगों के जुलूस निकल रहे थे। हम बचते-बचाते स्टेशन पहुंचे तो ट्रेन प्लेटफार्म पर खड़ी थी।
फौज के जवान मौजूद थे। शीला बहन व भाई को ट्रेन में बिठाया और ट्रेन के चलने का इंतजार करने लगे। तभी एक फौजी ने पिताजी के कान में आकर धीरे से फुसफुसा कर कहा, बहुत दंगे होने वाले हैं, हो सके तो अपने पूरे परिवार को ट्रेन में चढ़ा दो अगर जान बचानी है। पिताजी का कलेजा एक मिनट को धक रह गया।
कुछ समझ नहीं आ रहा था। ट्रेन का सायरन बज चुका था और ट्रेन चलने वाली थी। पिताजी को न जाने क्या सूझा और उन्होंने धीमे धीमे चलती हुई ट्रेन पर हम सब को चढ़ने को कहा। मां अवाक होकर उनका चेहरा देखने लगीं। ‘तो वो मां को समझाते हुए बोले, सोमा, मेरी गल मान लो, और बच्चों को लेकर ट्रेन में चढ़ जाओ और उन्होंने जबरदस्ती हमें धकेलते हुए ट्रेन में चढ़ा दिया, मां जी चिल्लाती रहीं, आप नहीं चलोगे क्या, तू अभी जा, जब हालात ठीक हो जाएंगे तो तुझे लेने आ जाऊंगा।
मेरी फिक्र मत करना, तू बच्चों का ख्याल रखना’। ट्रेन चल पड़ी और कुछ ही पल में पिताजी और हम एक दूसरे से अलग हो गए। तृप्ता ने कहा कि ट्रेन में 500 फौजी थे, जो बंदूकें हाथ में लिए हुए थे, उनको देख कर उन्हें डर जरूर लग रहा था। जगह जगह पर हमारी ट्रेन को उपद्रवियों ने रोका लूटपाट की। मारकाट करने के लिए पत्थरबाजी करते, वैसे ही फौजी जवाबी हमला करते और उनके हाथों में बंदूकें देखकर वह भाग जाते। उन दिनों हमने इंसानियत को शर्मसार और हैवानियत को अपनी पराकाष्ठा पर देखा था।
तीन दिन का लंबा सफर तय के कर के, भूख प्यास से बेचैन, पसीने और गंदगी से भरे तीन दिन के गंदे कपड़ों में जब हम दिल्ली स्टेशन पहुंचे। इसी धक्का-मुक्की से होते हुए जब मैंने पहली बार दिल्ली के स्टेशन पर अपना पहला कदम रखा तो नहीं मालूम था यही मेरी कर्मस्थली बनने वाली है। गोल डाकखाना का पता था, ताया के बेटे का, जो दिल्ली में रहता था।
वह डाकखाने में नौकरी करता था। उसे डाकखाने की तरफ से एक क्वार्टर मिला हुआ था। तांगे वाले को पता बताया और ताया के बेटे छत्रपाल सिंह के यहां पहुंच गए। एक ही कमरे का क्वार्टर था, जिसमें छह लोग जैसे तैसे समा पाते। मां को पिताजी की फिक्र थी, वह किस हाल में होंगे।
पिताजी का कोई भी अता पता नहीं था। सलामती के लिए दुआ होती रहती। कुछ दिन के बाद पिताजी पूछते-जांचते घर पहुंच गए। उन्हें देखकर सबकुछ खुश हो गए। भारत-पाकिस्तान के विभाजन में ताया को खो दिया। पिताजी की पूरी जिंदगी की मेहनत तबाह हो गई। विभाजन ने जो दर्द दिया है, उसे कभी नहीं भुलाया जा सकता। पिताजी ने दिल्ली के सदर में स्टोव का काम शुरू किया। उनकी तीसरी पीढ़ी विदेश में है।