अलीगढ़। एमएलसी चुनाव में सपा आला नेतृत्व ने खुद कमान संभाली। जिससे सपा उम्मीदवार की राह आसान हो सकी। यहां इस चुनाव में पूरे एक महीने तक गहमागहमी रही और राजनीतिक समीकरण बनते-बिगड़ते रहे। सपा हाईकमान किसी भी सूरत में इस सीट को जीतना चाहता था।
इसी के चलते नेतृत्व के आदेश पर कई बाहरी कद्दावर नेताओं ने सप्ताह भर तक यहां डेरा जमाए रखा। विपक्ष जब निर्दलीय उम्मीदवार के पक्ष में लामबंद हुआ तो कुछ नेताओं को खामोश किया गया तो कुछ पार्टियों में अंदरखाने बगावत जैसी स्थिति पैदा करा दी। सत्ता के डंडे के साथ अपनाए गए हर फंडे ने आखिरकार यह सीट सपा की झोली में डाल दी।
जिला पंचायत चुनाव में हाथरस और अलीगढ़ दोनों जिलों में सपा को मात मिली थी। तब पार्टी हाईकमान एमएलसी चुनाव को लेकर गंभीर हुआ। पहले यह आंकलन किया गया कि जिला पंचायत में कहां दल की स्थिति मजबूत रही है।
हाथरस में चूंकि एक वोट से ही पार्टी उम्मीदवार ओमवती यादव अध्यक्ष का चुनाव हारी थी। ऐसे में पार्टी ने उन्हें ही प्रत्याशी घोषित किया। बाद में उनके स्थान पर उनके पति जसवंत सिंह को उम्मीदवार बनाया। वह यूपीएसआईडीसी के रिटायर्ड अधिकारी हैं। उनके सामने पूर्व एमएलसी सुनील सिंह निर्दलीय चुनाव लड़ रहे थे। उन्हें भाजपा ने खुलकर समर्थन दे दिया और कई अन्य दल भी उनके साथ आ गए। इस पर पार्टी आलाकमान और ज्यादा गंभीर हो गया।
पार्टी ने हर स्थिति पर निगाह रखने के लिए बाहर से फिरोजाबाद जिला पंचायत अध्यक्ष जुगेंद्र सिंह यादव, एमएलसी डॉ. दिलीप यादव को यहां भेज दिया। उनके हाथ में चुनाव का मैनेजमेंट सौंप दिया। सपा मुखिया को रोजाना यहां से रिपोर्ट भेजी जाने लगी। विपक्ष के कुछ ने सुनील सिंह का समर्थन किया तो इन्हीं दलों के कुछ नेता सपा प्रत्याशी के साथ आ गए।
सपा के इन चुनाव मैनेजरों ने आखिरी समय तक पूरी ताकत झोंके रखी।
निर्दलीय प्रत्याशी के काफी वोटर तो आखिरी तीन दिन के अंदर तोड़े गए। सपा प्रत्याशी व उनके चुनाव मैनेजरों की निगाह अपने क्षेत्र को सहेज कर रखने और दूसरे के वोटरों में सैंध लगाने की रही। इस रणनीति में कामयाबी मिली। हर फंड़ा इस्तेमाल किया गया। आखिरकार सपा इस सीट को जीतने में सफल रही।