अलीगढ़। ‘‘ दो पाटों में फंसी जिंदगी, समस्याओं के पहाड़ खड़े
हुक्मरां आते-जाते रहे सवाल तो वहीं के वहीं खड़े ’’
चाहो तो इसे समाज का तानाबाना कह लो या पुरुषवादी मानसिकता का असर, अथवा महिलाओं की बेहतरी के लिए बने कानूनों की व्यावहारिक खामियां। घर और दफ्तर की दोहरी जिंदगी जीने वाली कामकाजी महिलाओं की स्थित उतनी बेहतर नहीं है जितनी दिखती है। घर के बाहर निकलकर जब वह अपने कार्यस्थल पर पहुंचती हैं तो वो सुकून नहीं महसूस करतीं जो एक पुरुष करता है। सरकारी दफ्तर में काम करने वाली महिला हो अथवा प्राइवेट जॉब करने वाली। वह अपने कार्यस्थल का माहौल फ्रेंडली चाहती हैं। एडवोकेट ठा. संध्या सिंह कहती हैं कि वर्तमान में वीमेन फ्रैंडली प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत है। सीएचसी लोधा पर कार्यरत प्रभा कुमारी कहती हैं शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन की जरूरत है। बच्चों को ऐसी शिक्षा दी जाए कि उनके अंदर पुरुष और महिला मानसिकता हावी न हो। महिलाएं रसोई में प्रयोग होने वाली वस्तुओं को सस्ता करने के उपाय भी चाहती हैं। छात्राएं चाहती हैं कि संसद ने उनके लिए जो कानून बनाए हैं उनकी खामियां दूर की जाएं। महिलाओं की जिंदगी सुगम और सरल बनाने के लिए सांसद और संसद दोनों को सोचना होगा, बात तभी बनेगी।