नगर निगम के लिए यह पांचवां मतदान है। बीते 23 वर्ष में नगर निगम में 4,85,512 मतदाता बढ़ गए। मगर मतदान का प्रतिशत पचास फीसदी का आंकड़ा नहीं छू सका। हालात इतने खराब हैं कि पिछली बार से भी चार फीसदी कम मतदान हुआ है। सवाल खड़ा हो रहा है, तमाम प्रयासों के बावजूद मतदान प्रतिशत नहीं बढ़ा है। प्रशासन के साथ ही प्रत्याशियों की मेहनत भी वो रंग नहीं ला सकी है।
पिछले कुछ वर्षों में व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, ब्लाग आदि के माध्यम से मतदाताओं को प्रेरित करने का प्रयास भी फीका है। कम से कम नगर निगम में मेयर एवं पार्षद पद के लिए अपनाई जाने वाली लोकतांत्रिक प्रक्रिया के आंकड़े यही कहानी बयां कर रहे हैं। तमाम कोशिशों के बाद भी मतदान का चलन बढ़ने की बजाय कम हो रहे हैं। शहर में मतदान प्रतिशत 50 का आंकड़ा नहीं छू पाया है, जो चिंतनीय विषय है।
अपेक्षाओं का पूरा न होना भी कारण
जानकारों का मानना है कि तमाम प्रयासों के बावजूद जनता के वोटिंग के प्रति रुझान में कमी का मुख्य कारण जनता की अपेक्षाओं का पूरा न होना भी है। पिछले करीब डेढ़ दशक में आम धारणा रही है कि महापौर अथवा पार्षद उनके दैनिक जीवन की जन समस्याओं के प्रति उदासीन दिखते हैं। समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रहती हैं। ऐसे में वोटर भी उदासीन बना हुआ है।