कासगंज। शहर के नबाबा मोहल्ले में राहे उरूज अदबी ग्रुप की तरफ से बृहस्पतिवार की रात मुशायरा और कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। गंगा-जमुनी तरजीह पर आधारित इस कार्यक्रम में देर रात तक काव्य की धारा बहती रही। कवियों ने कविताएं तो शायरों ने अपने कलाम पेश किए। मुशायरे का आगाज मोहम्मद उमर काविश की हम्दे-पाक एवं अंजुम रूमानी की नाते-पाक से हुआ।
नसीर अहमद ने कलाम पेश किया पर्दा उठा तो उधर दिन निकला, जुल्फ बिखरी तो इधर रात हुई। सिकंद्राराऊ के डॉ. दानिश कैफ़ी ने पढ़ा कि तेरी फुरकत में मेरी जाने-जहां। अब्दुल कदिर जिया ने सुनाया कि जब मेरी गम से मुलाकात हुई, ज़िंदगी पैकरे-आफ़ात आफ़ात हुई। दिलशाद अहमद उरूज ने पढ़ा कि इश्क़ का है, ये ज़माना दुश्मन, इश्क़ की जबसे शुरुआत हुई। तौसीफ अहमद ने सुनाया कि जब कभी उनसे मेरी बात हुई, देर तक आंखों से बरसात हुई। वारिस ने पढ़ा कि तुमने खिलौने तोड़ के अच्छा नहीं किया। आकिल हुसैन ने कलाम पेश किया माना बहुत हसीन है उसके लिए मगर। मोहम्मद उमर कविश ने पढ़ा कि यूं शाख़े-ए-गुल झंझोड़ के अच्छा नहीं किया। अंजुम रूमानी ने सुनाया कि छालों की शक्ल में जो निशानी किसी की थी। अध्यक्षता शायर आकिल हुसैन ने व संचालन अब्दुल कदीर जिया ने किया। दिलशाद अहमद उरूज व आयोजकों ने कवियों व शायरों का फूल माला पहनाकर स्वागत किया। इस दौरान अकरम वारसी, हसनैन शाद, नाज़िम बिलरामी, साजिद क़ुरैशी, महेश संघर्षी, आतिश सोलंकी, डॉ. मोहम्मद मियां वफ़ा, अनवर कैफ़ आदि मौजूद रहे।