मैनपुरी। देश विभाजन के समय पाकिस्तान से आए शरणार्थी परिवार हिंदुस्तान में खुद को महफूज मानते हैं। पाकिस्तान से खाली हाथ आए परिवारों ने मेहनत-मजदूरी करके खुद को स्थापित किया है। राष्ट्रीय पर्वों को यह परिवार जोशोखरोश के साथ मनाते हैं। विभाजन का मंजर याद करके परिवार के बुजुर्गों की आंखें नम हो जाती हैं।
विभाजन के समय कई हिंदू परिवार पाक छोड़कर हिंदुस्तान आए थे। पंजाब से खाली हाथ आए परिवारों को शरणार्थी माना गया। शुरू में धर्मशाला में रहे यह परिवार बाद में किराए के मकानों में रहने लगे। इन परिवारों ने शुरूआती दिनों में हथठेल लगाई। दुकानों पर नौकरी की। गलियों में घूमकर सामान बेचा। धीरे-धीरे शहर की एक गली में मकान बनाकर रहने लगे। बाद में इस गली की पहचान पंजाबी कॉलोनी के नाम से बनी।
प्रकाश कुमारी बताती हैं वह ससुर नेबराज तथा पति शानीलाल कालरा के साथ विभाजन के समय खाली हाथ आई थीं। उस समय पाकिस्तान का मंजर खौफनाक था। हिंदू परिवारों का चुन चुनकर कत्लेआम किया जा रहा था। शुरू में पति ने मजदूरी की। बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। उनके पुत्र प्रभू कालरा, यश कालरा, रवि कालरा आजाद भारत में खुद को महफूज महसूस करते हैं।
खेमकरन कालरा बताते हैं कि पाक में हिंदू परिवारों पर अत्याचार किए जा रहे थे। यह देख पिता शिवदयाल ने देश का बंटवारा होने पर हिंदुस्तान आने का फैसला लिया था। पिता शुरू में करहल रोड पर बाल निकेतन स्कूल के पास किराए के मकान में रहे। मां देवी बाई बंटवारे का मंजर याद करके रोती थीं। भाई रामनरायन, नरेश मैनपुरी में जबकि महेश दिल्ली में रहते हैं।