आगरा के गांव पनवारी में बृहस्पतिवार को दोपहर बाद पेड़ों के नीचे लगी चौपालों पर बैठे बुजुर्ग इस कांड की चर्चा में मशगूल दिखाई दिए। न्यायालय का फैसला आने के बाद हर्ष की लहर थी। बुजुर्गों का कहना था कि घटना के बाद कई माह तक गांव छावनी में तब्दील रहा था। बड़े-बड़े नेता गांव आए थे।
घटना के बाद बहुत लोगों ने छोड़ दिया था गांव
तकरीबन चार हजार की आबादी के वाले पनवारी गांव का नाम 1990 में हुए जातीय संघर्ष के बाद चर्चित हुआ था। न्यायालय के फैसले की खबर दोपहर को ही गांव के लोगों तक पहुंच गई थी। लोग इस कांड की चर्चा करते नजर आ रहे थे। बुजुर्गों का कहना था कि उस वक्त को याद नहीं करना चाहते हैं। कई माह तक गांव छावनी ही बना रहा था। घटना के बाद बहुत लोगों ने गांव ही छोड़ दिया। रुनकता और शहर में जाकर रहने लगे। फैसले पर ज्यादातर लोगों का कहना था कि न्यायालय ने दूध का दूध, पानी का पानी कर दिया।
राजनीतिक कैरियर को खत्म करने की हुई थी कोशिश
विधायक बाबूलाल चौधरी के भतीजे शिशुपाल सिंह का कहना था कि चौधरी बाबूलाल तब उभरते हुए नेता थे। उनके राजनीतिक कैरियर को खत्म करने की कोशिश की गई, लेकिन अंत में जीत सच्चाई की हुई। गांव के सुखवीर का कहना था कि पुरानी यादें ताजा नहीं करना चाहते हैं। गांव में अब तक बहुत कुछ बदल चुका है।
गांव में बांटी गईं मिठाई
फैसला आने के बाद गांव में मिठाई भी बांटी गई। इस दौरान घूरेलाल आर्य, अरविंद चाहर, विनोद अग्रवाल, सुंदरलाल बंसल, तनुज सिंघल, डॉ. एचएस इंदौलिया, पंकज राहुल चौधरी, गजाधर सिंह, अशोक अग्रवाल, गोपाल सिंह, राजवीर सिंह, पवन इंदौलिया, दीवान सिंह, हरिपाल सिंह आदि मौजूद रहे।