आगरा नगर महापालिका का भवन (1965 की तस्वीर)
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आगरा नगर निगम सदन के आखिरी अधिवेशन में पार्षदों और मेयर ने लोगों पर बोझ डालने वाले गृहकर के सर्वे को निरस्त कर दिया, जो चुनाव से ठीक पहले शहर के लोगों की परेशानी बना हुआ था। गृहकर (हाउस टैक्स) सबसे पहले वर्ष 1913 में आगरा नगर पालिका ने शुरू किया था। गृहकर से पहले नगर पालिका की आय का सबसे बड़ा हिस्सा चुंगी से आता था, लेकिन 1913 में गृहकर की शुरुआत हुई, जो संपत्ति की कीमत पर 4.25 फीसदी लगाया जाता था। नगर पालिका ने 1920 में यमुना नदी पर वाटर टर्मिनल टैक्स, वाहनों पर कर के साथ मवेशियों को आयात करने पर टैक्स लगाया। इसके साथ ही हाथगाड़ी, जमीन, बिल्डिंग के किराए, लाइसेंस फीस, बाजार, जुर्माना और स्लॉटर हाउस से आय के स्रोत बढ़े।
1946 में पहली बार बढ़ा गृहकर
आगरा गजेटियर में इसका पूरा ब्योरा दर्ज है। गजेटियर के मुताबिक 1913 में जिस गृहकर की शुरुआत हुई, उसे पहली बार 1946 में बढ़ाया गया। स्वतंत्रता से ऐन पहले नगर पालिका ने गृहकर की दरें 4.25 फीसदी से बढ़ाकर 6.75 फीसदी कर दीं। पालिका की आय बढ़ने का असर ये रहा कि पहली बार 1946 में शहर के नालों के लिए योजना बनी, जिसमें 12.78 लाख रुपये खर्च किए गए। तब 13 कच्चे नालों, 6 पक्के नालों की योजना पर कार्य हुआ। इनमें से तीन नाले पहले से ही पक्के थे, जिनमें मंटोला नाला, नूरी गेट और भैरों नाला थे, जबकि पीपलमंडी, काजीपाड़ा, बाग मुजफ्फर खां के नाले कच्चे बने थे। इन्हें पक्का करने के साथ इनकी क्षमता बढ़ाई गई।
1957 में कैंट की 303 एकड़ जमीन मिली
वरिष्ठ पत्रकार और निकाय विशेषज्ञ राजीव सक्सेना के मुताबिक आगरा नगर पालिका को 1957 में आगरा छावनी क्षेत्र की 303 एकड़ जमीन भारत सरकार की ओर से दी गई। यह जमीन मिलने के बाद नगर पालिका ने शहर को सात हिस्सों में बांटा, जिन्हें कोतवाली, छत्ता, लोहामंडी, हरीपर्वत, रकाबगंज, ताजगंज और वार्ड नंबर 7 का नाम दिया गया। आय बढ़ाने के प्रयासों में नगर पालिका की आय पहली बार 1960 में एक करोड़ के पार पहुंची। वर्ष 1960 में आगरा नगर महापालिका बनने के बाद 1.16 करोड़ रुपये की आय कर पाया, जबकि अब 62 साल बाद नगर निगम के रूप में आय 880 करोड़ रुपये है।