ताजगंज की कहानी ताजमहल से जुड़ी है। ताजमहल बना, इसलिए ताजगंज बसा। दरअसल, 20 हजार मजदूर और कारीगर ताजमहल को तामीर करने के लिए लगाए गए थे। इन्हें पास में ही रहने के लिए जगह दी गई। एक छोटा कस्बा बस गया। इतिहासकार राज किशोर राजे बताते हैं कि उस समय इसे नाम दिया गया था मुमताजाबाद। बाद में यही मुमताजगंज और फिर ताजगंज हो गया। यहां चार कटरे हैं कटरा रेशम, फुलेल, जोगीदास और उमर। यहां की दो हस्तियां मशहूर हुईं कवि नजीर अकबराबादी और गायक मियां मान्ध।
व्यापार की बड़ी मंडी थी
मजदूरों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य लोग यहां आकर बसे। यमुना नदी का किनारा होने के कारण मुगल काल में ताजगंज व्यापार का बड़ा केंद्र बना। यहां साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक बाजार लगते थे जो बाद में मंडी बने जैसे गुड़ियाई, दलियाई, बकरियाई। अंग्रेजों के जमाने तक यहां हर सोमवार और शुक्रवार को हाट लगती थी जिसे नजिहाई कहते थे।
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व्यापार का प्रमुख केंद्र था आगरा
राजकिशोर राजे ने बताया कि मुगलिया दौर में आगरा व्यापार का बड़ा केंद्र रहा। अकबर के समय में देश का ही नहीं, एशिया के प्रमुख बाजार लाहौर और आगरा थे। अकबर के वजीर ए आजम रहे अबुल फजल ने भी इसका वर्णन किया है। दरी-गलीचे, शॉल, मसाले, हाथी दांत, सूती वस्त्र, लोहे के हथियार का कारोबार होता था। आगरा और सीकरी में सिक्कों की टकसालें थीं।
मंडियां ही नहीं, गंज और हाई भी
इतिहासकार सुगम आनंद ने बताया कि व्यापार को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए अकबर के समय सिर्फ मंडियों की ही स्थापना नहीं की गई, बल्कि हाई और गंज भी बनाए गए। हाई ऐसी जगह होती थी जहां साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक बाजार लगते थे, जैसे नुनिहाई। इसी तरह गंज संभवत: वे स्थान थे, जहां सामान का भंडारण किया जाता था, जैसे ताजगंज, बेलनगंज, शाहगंज, आलमगंज, मोतीगंज।